मथुरा। सरकार ने जनपद के 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का नजदीकी विद्यालयों में विलय तो कर दिया, लेकिन व्यवस्थाएं अब भी जस की तस हैं। स्कूलों के यू-डायस नंबर अलग-अलग हैं। एमडीएम के रजिस्टर एकीकृत नहीं हुए हैं। मगर सबसे बड़ी समस्या स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी) खातों में आई धनराशि को लेकर खड़ी हो गई है।
बंद हुए विद्यालयों के एसएमसी खातों में कंपोजिट ग्रांट की रकम आ चुकी है। अब प्रधानाध्यापक परेशान हैं कि यह धनराशि किस विद्यालय में खर्च की जाए, क्योंकि वे तो विलय किए गए स्कूल में स्थानांतरित हो चुके हैं। जबकि शिक्षा अधिकारियों ने आदेश दिया है कि 30 सितंबर तक यह धनराशि खर्च करना अनिवार्य है। नहीं तो संबंधित प्रधानाध्यापकों का वेतन रोक दिया जाएगा। ऐसे में प्रधानाध्यापक और शिक्षक ऊहापोह की स्थिति में हैं। शिक्षकों का कहना है कि विलय के बाद भी खातों और रिकॉर्ड का एकीकरण न होना सबसे बड़ी समस्या है। यदि समय रहते स्पष्ट दिशा-निर्देश न मिले तो न तो धन का सही उपयोग हो पाएगा और न ही शिक्षण कार्य प्रभावित होने से बच सकेगा। ऐसे में तमाम शिक्षक विभागीय अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। वहीं कई प्रधानाध्यापकों ने अपने खंड शिक्षा अधिकारियों से लिखित शिकायत की हैं।
इसलिए आती है धनराशि
एसएमसी के खातों में आई धनराशि को विद्यालयों की रंगाई-पुताई, मरम्मत, फर्नीचर का सामान, स्कूल के लिए स्टेशनरी और अन्य कार्याें के लिए खर्च किया जाता है। मगर जब विद्यालय ही बंद हो गया है तो धनराशि को किस जगह खर्च किया जाए।
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एसएमसी खातों में आई धनराशि बाल वाटिका के रूप में खर्च होनी है। जिस विद्यालय के लिए धनराशि आई है, पहले उसमें खर्च किया जाएगा। जो धनराशि बचेगी, उसे विलय हुए विद्यालयों में खर्च किया जाएगा।
रतन कीर्ति
बीएसए मथुरा