जिले में फसल का बीमा करने वाली कंपनी सूखा से बर्बाद हुई फसलों के बाद भी किसानों से मुनाफा कमा रही है। खरीफ की फसल के दौरान बीमा प्रीमियम के रूप में कंपनी ने 9.73 करोड़ रुपये हासिल किए थे। सूखा पड़ने पर जब क्लेम देने की बारी आई तो ऐसा आकलन किया कि बर्बाद किसानों को सिर्फ 9.28 करोड़ रुपये थमा दिए गए।
पिछली खरीफ की फसल के दौरान जिले में 18811 किसानों की फसल का विभिन्न बैंक और सहकारी समितियों के माध्यम से बीमा किया गया। इसके लिए बीमा कंपनी को 9.73 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में दिया गया। इसमें 4.17 करोड़ रुपये किसानों से लिया गए और बाकी राशि केंद्र और राज्य सरकार ने किसानों की फसल के लिए बीमा कंपनी को दिए। इससे 24283 हेक्टेयर धान, बाजरा और तिल की फसल का बीमा किया गया।
यह फसल जिले में सूखा पड़ने से बुरी तरह प्रभावित हुईं। जिला प्रशासन की रिपोर्ट पर शासन ने जिले को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया, यहां सूखा का प्रभाव 50 से 60 प्रतिशत दर्शाया गया। इसके बाद जब जिला के सूखा प्रभावित इन किसानों को फसल बीमा क्लेम देने की बारी आई तो कंपनी ने 9.28 करोड़ रुपये का आकलन करते हुए 18811 किसानों को थमा दिए, जो बीमा प्रीमियम से भी कम राशि है।
शक के दायरे में बीमा कंपनी
बीमा कंपनी के फसल नुकसान के आकलन पर किसान ही नहीं अफसर भी हैरान हैं। समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर कंपनी ने प्रभावित फसल का आकलन किस आधार पर किया है। पिछले सप्ताह जब बीमा क्लेम के संबंध में बीमा कंपनी, बैंक और अफसरों के बीच बैठक में यह प्रश्न उठा तो बीमा कंपनी अधिकारियों के पास अफसरों की प्रश्नों का कोई जवाब नहीं था।
शासन को जा रही है रिपोर्ट
मथुरा। जिले में बीमा कंपनी के खेल पर जिला प्रशासन की ओर से शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही है। इसमें कंपनी पर सवाल उठाते हुए किसानों को बीमा का उचित लाभ न मिलने की जानकारी दी जा रही है। बीमा कंपनी की शर्तें क्या हैं? यह भी किसी को नहीं मालूम। फसली ऋण पर बीमा करने वाले बैंक अफसर और सहकारी समितियों के अधिकारी भी अंजान हैं कि जो प्रीमियम किसानों के ऋण से काटा जा रहा है, उसके एवज में दैवीय आपदा की स्थिति में किसानों को क्या मिलेगा।
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में मिलता था शतप्रतिशत लाभ
मथुरा। 2002 में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अंतर्गत फसल में 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर किसान को शत प्रतिशत बीमा क्लेम मिलता था। इस योजना में बीमा क्लेम का भुगतान सरकारी बीमा कंपनी करती थी, लेकिन निजी बीमा कंपनी के हाथों यह व्यवस्था आने के बाद बर्बाद हो रहे किसानों को फसल बीमा होने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लग रहा है।
सूखा प्रभावित किसानों को दिए गए क्लेम के मामले में बीमा कंपनी की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। इसके लिए कंपनी के साथ हुए सरकार के अनुबंध और बीमा की शर्तों की जानकारी मांगी गई है। इस पूरे मामले की जानकारी शासन को भी दी जा रही है। यह बात चौंकाती है कि सूखा प्रभावित जिले में बीमा का क्लेम कंपनी को दिए गए प्रीमियम से भी कम है।
- धीरेंद्र सचान, एडीएम वित्त एवं राजस्व