पहाड़ियों पर जब शीत का प्रहार तीखा हो जाता है, तब भी लाडलीजी के गर्भगृह में एक अलौकिक ऊष्मा रहती है। ब्रज की महारानी राधारानी के समीप पहुंचकर ऋतुएं भी अपनी कठोरता त्याग देती हैं। मंदिर की सेवा परंपरा इतनी सूक्ष्म, इतनी तेजस्वी और इतनी दिव्य है कि सर्दी द्वार तक जाकर रुक जाती है और भीतर केवल प्रेम का प्रकाश फैलता है।
बरसाना की रात जब अपने सबसे ठंडे रूप में उतरती है, हवा पहाड़ियों की ढलानों पर पाला बिछाती है और आंगन में ओस की बूंदे कांच की तरह चमकने लगती हैं, तभी लाडलीजी मंदिर के भीतर एक और ही लोक जाग उठता है। यह वह लोक है जहां मौसम का अधिकार समाप्त हो जाता है और सेवा का विधान आरंभ होता है। राधारानी ब्रज की महारानी हैं और उनके समीप आते ही प्रकृति भी अपने नियम बदल देती है। गर्भगृह के भीतर सेवायत जब प्रवेश करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो ताप किसी अदृश्य स्त्रोत से जन्म ले रहा हो। यह ताप बिजली का नहीं, हवाओं का नहीं, बल्कि अनन्य प्रेम का है।
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वह प्रेम जो युगों से इस भूमि पर सेवा बनकर धड़क रहा है। सेवा का आरंभ रात के उस पहर से होता है, जब पहाड़ियां चुप होती हैं और गांव निद्रा में डूबा होता है। सेवायत के चरण मंदिर की सीढि़यो पर अत्यंत संयम से उतरते हैं, जैसे उनके तलवों की आहट से भी ठंड को भीतर आने का अवसर न मिल जाए। राधारानी के वस्त्र बदलने का यह क्षण किसी राजसी अनुष्ठान जैसा होता है। हलके रेशमी परिधान हटाकर ऊनी पोशाक, गरम दुशाला और रजाई की परतें एक के ऊपर एक इस भाव से सजाई जाती हैं कि महारानी को शीत का स्पर्श भी न हो। वस्त्रों की इन परतों में केवल सौंदर्य नहीं, तपस्या भी गुंथी होती है। एक सेवक हाथों में दुशाला लेकर खड़ा होता है, दूसरा दीपक की लौ को स्थिर करता है, तीसरा गर्भगृह की हवा को नियंत्रित रखने वाली अंगीठी तैयार करता है।
इन सबका उद्देश्य एक ही होता है, गर्भगृह में बसंत को जीवित रखना। शीत ऋतु के भोग में भी आवश्यक परिवर्तन कर दिए गए हैं। अब रात्रि विश्राम से पूर्व मेवायुक्त गरम दूध तथा केसर, काजू, पिस्ता और बादाम से बने हलवे का भोग अर्पित किया जा रहा है। दिन के समय भी साधारण प्रसाद हटाकर गरमाहट देने वाले व्यंजन सेवा में सम्मिलित किए गए हैं। यह संपूर्ण व्यवस्था मंदिर सेवायत रासबिहारी गोस्वामी ने बताई। मंदिर के दरवाजों पर टंगे मोटे पर्दे इस सेवा का बाहरी कवच हैं। इन पर्दों को सेवायत दिन में कितनी ही बार ठीक करते हैं, ताकि बाहर की हवा एक क्षण के लिए भी भीतर पहुंचने का मार्ग न पा सके। प्रतीत होता है, मानो स्वयं ऋतुएं इन पर्दो के सामने नतमस्तक होकर थम जाती हों।
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जब श्रद्धालु मंदिर प्रांगण में कदम रखते हैं, तो उन्हें वातावरण में एक अद्भुत परिवर्तन का अनुभव होता है। बाहर पहाड़ियो की ढलानों से उतरती तेज सर्द हवा जैसे ही प्रांगण के द्वार तक आती है, वह अपनी तीखी धार खो देती है। भक्तों को ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी अदृश्य शक्ति ने ठंड को वहीं रोक दिया हो। प्रांगण में खड़े भक्त अक्सर कहते हैं कि बाहर की ठिठुरन और भीतर की ऊष्मा का अंतर केवल तापमान का नहीं, बल्कि अनुभूति का है।