वृंदावन। ठंड का प्रभाव लाड़ले ठाकुर बांकेबिहारी महाराज पर न पड़े इसके लिए सेवायतों द्वारा आराध्य को गर्म पोशाक पहनाने के साथ ही साथ तप्तपदार्थों का भोग निवेदित किया जा रहा है। मेवा का भोग लगाया जा रहा है। चंदन के टीके, भोग और माखन-मिश्री में केसर मिलाया जा रहा है।
मंदिर के सेवायत प्रह्लाद वल्लभ गोस्वामी का कहना है कि ठाकुर बांकेबिहारी महाराज की बाल रूप सेवा हैं। बिहारीजी को पशमीनी शाल धारण कराकर ऊपर से गर्म कपड़ों की पोशाक पहनाई जा रही है। शयन शैया पर भी हल्के सूती चादर, गद्दों का स्थान अब शैमल की रुई के शनील चढ़े गद्दों, सात तकियों और रजाई ने ले लिया है। प्रात: काल 8 बजे शृंगार भोग में केसर मिश्रित मूंग की दाल का हलवा, माखन-मिश्री निवेदित किया जा रहा है। केसर, काजू, किसमिस, चिरोंजी, पिश्ता, बादाम, अखरोट इत्यादि मेवाओं का प्रयोग खाद्य पदार्थों में होने लगा है। दोपहर राजभोग में कच्चे भोजन में दी जाने वाली खीर में सूखे मेवे डाले जा रहे हैं। केसर डालकर दूध-भात भी ठाकुरजी को भाता है। शाम को (उत्थापन) में चाट का भोग और शयन से पूर्व मेवा-केसर मिश्रित दूध का भोग दिया जा रहा है।
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कटोरे में 8 लड्डू भी रखे जा रहे
ठाकुर बांकेबिहारी महाराज के शयन के बाद शयन कक्ष में चांदी के कटोरे में मेवायुक्त 8 लड्डू, चार पान के बीड़ा और चांदी के लोटे में गुनगुना पानी रखा जाता है। रात में यदि ठाकुरजी की आंखें खुल जाए और उन्हें भूख-प्यास लगे तो वह परेशान न हों।
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मालिश में केसर इत्र का प्रयोग
ठाकुर बांकेबिहारी महाराज की मालिश वर्षभर की जाती है। गर्मी में चंदन, गुलाब, खस आदि इत्र से मालिश होती है वहीं ठंड के मौसम में हिना, केसर इत्र से ठाकुरजी की मालिश की जा रही है।