सूखा, बारिश और ओलावृष्टि जैसी विपरीत परिस्थितियाें में किसान चिंतित न हाें। वे उन्नत बीजों का इस्तेमाल कर कम समय में ही बेहतर उत्पादन पा सकते हैं। यह कहना है नौहझील ब्लॉक गांव भूरेका निवासी प्रगतिशील किसान सुधीर अग्रवाल का।
सुधीर ने यह तकनीक अपनाकर और इसका प्रचार कर सफलता पाई है। यही कारण है कि उनके प्रयासों को भारत सरकार की संस्था नास (नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस) से सिल्वर जुबली अवार्ड देकर सम्मानित किया।
बीते कई वर्षों से देश में किसान प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। देश के कई इलाकों में सूखा है तो कई अधिक बरसात से परेशान हैं। ये विपरीत परिस्थितियां फसलों के उत्पादन पर प्रभाव डालती हैं। इनसे निपटने के लिए विज्ञानी प्रयोगशाला में नित नई खोज कर रहे हैं।
मथुरा के प्रगतिशील किसान सुधीर अग्रवाल का इन खोजों के आधार पर बीज तैयार करने और उन बीजों को किसानों तक पहुंचाने में अहम योगदान रहा है। उनके इस प्रयास के लिए 5 जून को दिल्ली में नास के रजत जयंती समारोह में भारत में हरित क्रांति के प्रणेता कृषि वैज्ञानिक डा. एमएस स्वामीनाथन ने सिल्वर जुबली अवार्ड से नवाजा। यह पुरस्कार नास की स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में दिया गया।
सुधीर के अलावा तीन अन्य लोगों को भी यह पुरस्कार मिला। इसमें किसान सुधीर चड्ढा, एनसी सिपानी और केआरबीएल लिमिटेड के चेयरमैन और एमडी अनिल मित्तल शामिल हैं। इस अवसर पर नास के अध्यक्ष एस अयप्पन सहित देश के जाने-माने विज्ञानी मौजूद थे।
मौसम परिवर्तन के दौरान किसान परंपरागत खेती को छोड़कर कम समय में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख करें। धान के सीजन में सूखे की आशंका पर किसान पूसा प्रजाति 1509, 2511, 1692 और पूसा बासमती 1592 का उत्पादन करें। ये सभी धान 110-120 दिन में तैयार हो जाते हैं।
सुधीर अग्रवाल, प्रगतिशील किसान, मथुरा
शोध का अध्ययन कर तैयार करते हैं बीज
मथुरा। सुधीर बीजों को तैयार करने में कड़ी मेहनत करते हैं। प्रगतिशील किसान ने बताया कि सर्वप्रथम भारत सरकार हमें प्रजनक बीज उपलब्ध कराती है। इसके बाद सबसे पहले खेतों में इससे फाउंडेशन-प्रथम तैयार किया जाता है। इस दौरान उत्तर प्रदेश बीज प्रमाणीकरण संस्था के प्रतिनिधि गहनता से निरीक्षण करते हैं। बीज तैयार होने के बाद प्रमाणीकरण, पैकिंग की अनुमति दी जाती है। यह प्रक्रिया फाउंडेशन-द्वितीय और सर्टिफाइड सीड बनने तक जारी रहती है। गुणवत्ता परक बीज तैयार होने के बाद सरकार तैयार बीज को बाजार में बेचने की अनुमति प्रदान करती है।
गेहूं की 38 प्रजातियों का प्रयोग
मथुरा। सुधीर ने बताया कि उनके यहां विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा तैयार गेहूं की 38 प्रजातियों के बीज का उत्पादन किया जाता है। इसके अलावा पूसा द्वारा तैयार धान की सभी प्रजातियों, सरसों, उड़द, मूंग, चना के बीज का उत्पादन किया जाता है। इसे चंबल फर्टिलाइजर, जीएस ग्रुप, श्रीराम ग्रुप सहित देश के बड़े विक्रेताओं के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाता है। वे सीधे भी किसानों को बीज उपलब्ध कराते हैं।