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Mathura News: शक्ति, प्रेम और सम्मान का संगम है लठामार होली

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मथुरा। रंगीली चौक पर लाठी लेकर खड़ी बरसाना की हुरियारिन। - फोटो : mathura
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राम पंडित
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बरसाना (मथुरा)। बरसाना की गलियों में जब होली की नायिका हुरियारिनें सोलह शृंगार कर हाथों में लाठियां थामे उतरती हैं, तो नंदगांव के हुरियारों की हिम्मत जवाब देने लगती है। हंसी-ठिठोली के इस आयोजन में कहीं न कहीं परंपरा का सम्मान भी छिपा है। भक्तों के सैलाब, गलियों में उड़ता रंग और गुलाल, होली के हुड़दंग के बीच भी हुरियारिनों पर रंग डालने की कोई हिम्मत नहीं कर पाता है। बरसाना की गलियों में जब हुरियारिनें सज-धज कर निकलतीं हैं, अच्छे-अच्छे दिग्गज रास्ता छोड़ देते़ हैं। इस दौरान उनके तेवर किसी वीरांगना से कम नहीं होते हैं। यह नजारा महज एक परंपरा नहीं, बल्कि शक्ति, प्रेम और सम्मान का संगम भी है।
मान्यता है कि लठमार होली में केवल ब्राह्मण परिवार की बहुएं ही हुरियारिन बन सकतीं हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे निभाने के लिए महिलाएं पूरे उत्साह से तैयार होती हैं। यही नहीं किसी ब्यूटी पार्लर या मेकअप का सहारा नहीं लेतीं बल्कि पारंपरिक तरीके से ही शृंगार करतीं हैं। गहनों से सजी, पारंपरिक परिधानों में लिपटी हुरियारिनें जब मैदान में उतरती हैं, तो दृश्य अविस्मरणीय बन जाता है।
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करीब एक हजार हुरियारिनों ने इस साल लठामार होली में भाग लिया। इनके साथ परिजन और गांव के बुजुर्ग भी मौजूद थे। नंदगांव से आए हुरियारे भी इस प्रेम और चुनौती से भरे खेल में शामिल थे।
हुरियारिनों पर रंग न डालने के पीछे गहरी आस्था भी है। हुरियारिनें राधारानी की सखियां मानी जातीं हैं और नंदगांव के हुरियारे भगवान कृष्ण के प्रतीक। यह प्रेम का खेल है, जिसमें रंग से ज्यादा भावनाओं का महत्व होता है।
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रंगीली गली से गुजरते हुए हुरियारिनें जब लाठियां बरसाती हैं, तो पूरी गलियां गूंज उठतीं हैं। हुरियारे, जो होली के इस खेल का दूसरा पक्ष होते हैं, शरारत और हंसी-ठिठोली से माहौल को हल्का बनाने की कोशिश करते हैं। संवाद
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