मथुरा। पिता की गोद में खेलती सरस्वती।
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मथुरा। रेलवे जंक्शन से अगवा हुई एक साल की सरस्वती अपहरणकर्ता के चंगुल से तो मुक्त हो गई, लेकिन अब तक उसे अपनों का साथ नहीं मिल सका। राजकीय शिशु गृह में आवासित सरस्वती का बृहस्पतिवार को पहला जन्मदिन भी था। जीवन के इस विशेष दिन पर भी उसे अपनों के प्यार के बजाय तोहफे में तन्हाई मिली।
मध्यप्रदेश के जबलपुर के गांव मझौली के रहने वाले आनंद और पूजा की छोटी बेटी सरस्वती को जीआरपी ने अपहरण के दो दिन बाद ही 24 अगस्त को आगरा से ढूंढ निकाला था, लेकिन माता-पिता द्वारा पहचान साबित न कर पाने के चलते बाल कल्याण समिति ने बेटी को राजकीय शिशु गृह भेज दिया। पांच दिन से यही उसका ठिकाना है। 28 अगस्त को सरस्वती का पहला जन्मदिन भी था। जहां उसे जन्मदिन पर अपनों का प्यार मिलना था, वहां उसे तन्हाई का तोहफा मिला। बिना माता-पिता के ही उसका जन्मदिन भी बीत गया।
सरस्वती की निगाहें जहां अपनों को तलाशती रहीं तो वहीं मां पूजा की बाहें बिटिया के लिए तरसती रहीं। आनंद और पूजा पहचान साबित करने के लिए अभिलेख जुटाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालात के आगे वे भी मजबूर हैं। अब उनके पास केवल एक ही रास्ता बचा है, उसी की खोज में वे जबलपुर निकल गए हैं। आनंद के अनुसार सरस्वती का जन्म जबलपुर के एक सरकारी अस्पताल में हुआ था। जानकारी के अभाव में उसने वहां से जन्म प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किया था। अब वहां से जन्म प्रमाण पत्र मिलने की उम्मीद ही बेटी से मिलाने का एक मात्र रास्ता है। अगर जल्द ही जन्म प्रमाण पत्र मिल गया तो सरस्वती को फिर से अपनों का साथ नसीब हो सकेगा।
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बाल कल्याण समिति ने कहा पहचान जरूरी
सरस्वती की सुपुर्दगी किसे दी जाएगी, इसकी जिम्मेदारी बाल कल्याण समिति की है। समिति के अध्यक्ष राजेश दीक्षित ने बताया कि नियमानुसार बच्ची की सुपुर्दगी के लिए मां-बाप की पहचान करना जरूरी है। उनका कोई स्थायी निवास न होने के चलते पुलिस भी उनका सत्यापन करने में असमर्थ है। अगर माता-पिता कोई भी पहचान पत्र उपलब्ध करा दें, तो बच्ची की सुपुर्दगी उन्हें दे दी जाएगी।