एक ऐसी होली जिसमें बिना रंग के भी रंग बरसता हो। बिना भीगे भी तन मन सराबोर हो जाता हो। इसमें रंग की जगह रस की बरसात होती है। इससे सौहार्द और भाईचारे की भावनाएं और प्रबल हो जाती थीं। ये थी सांखी की होली। आजकल यह होली यदा-कदा ही देखने को मिलती है।
तीन-चार दशक पूर्व कस्बे में सांखी की होली नंदगांव की लठामार होली के एक दिन बाद और धूल होली पर कृष्ण कुंड के निकट खेली जाती थी। इस होली में बडे़ ही सभ्य तरीके से महिलाएं और पुरुषों में काव्य के माध्यम से छेड़खानी होती थी।
पुराने दिनों को याद करते हुए 74 वर्षीय रामशरण बताते हैं कि चार दशक पूर्व नंदबाबा मंदिर से निकली चौपई की टोली के पीछे-पीछे महिलाएं सजधज कर हाथों में लाठियां लेकर कृष्ण कुंड पर पहुंचती थीं। फिर शुरू हो जाती थी सांखी की होली।
पुरुष काव्य के रूप में सभ्य और शालीन भाषा में महिलाओं को छेड़ते थे। इस पर महिलाएं लाठियां लेकर उनके पीछे भागती थीं। महिलाएं भी सांखी का जवाब सांखी से ही देती थीं और फिर होता था नृत्य का धमाल। रामशरण बताते हैं कि अब आपस में इतना प्रेम नहीं रहा। काम की अधिकता और बढ़ते राग-द्वेष के चलते प्राचीन परंपरा विलुप्त हो गई है।
तीन दशक पूर्व रात भर चौपइयों का दौर चलता था। दूर दराज से लोग इसका आनंद लेने के लिए आते थे। आजकल चौपइयां यदाकदा ही देखने और सुनने को मिलती हैं। आजकल सांखियों और चौपइयों का स्थान संगीतमय भजन और रसियों ने ले लिया है।