खाद्य विभाग के अधिकारियों ने बीते तीन सालों में मात्र 99 नमूने संकलित कर प्रयोगशाला जांच को भेजे। ऐसा तब है जबकि जिले में मिलावट का गोरखधंधा बड़े पैमाने पर चल रहा है। दुग्ध पदार्थों में मिलावट की लगातार शिकायतें रहती हैं। वैसे प्रयोगशाला भेजे गए नमूनों में से केवल 54 नमूनों की जांच रिपोर्ट ही मिल सकी है। तीन नमूनों को जीवन के लिए असुरक्षित माना गया है।
फूड एंड सेफ्टी एक्ट लागू होने के बाद भी खाद्य विभाग कछुआ गति से चल रहा है। आलम ये है कि तहसील स्तर पर अफसरों की टीम होने के बाद भी बीते तीन सालों में कुल 99 नमूने ही लिए गए। ये आंकड़े विभाग ने ही उपलब्ध ही कराए हैं।
आरटीआई कार्यकर्ताओं की संस्था Òपरिवर्तन’ द्वारा जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई सूचनाओं में विभाग के अभिहित अधिकारी ने ये आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। वित्तीय वर्ष 2012-13 में विभागीय टीम ने कुल 26 नमूने संकलित किए। इसमें खोआ का एक, घी का एक नमूना मानकों पर खरा नहीं उतरा है। वहीं दूध से बनी मिठाई और अखाद्य रंगों का एक नमूना असुरक्षित आया है।
2013-14 विभागीय अफसरों ने कुल 28 नमूने लिए। इसमें एक नमूना पनीर सहित कुल दो नमूने अधोमानक पाए गए। दूध का एक नमूना असुरक्षित आया है। 2015-16 में विभाग ने कुल 45 नमूने लिए। इसमें दूध के दो, खोआ के चार, घी का एक, दूध की मिठाई के चार सहित कुल 12 नमूने फेल आए। इस साल एक भी नमूना अनसेफ (असुरक्षित) नहीं आया है।
बड़े पैमाने पर मिलावट का गोरखधंधा
मथुरा। खाद्य विभाग ने तीन साल के जो आंकड़े उपलब्ध कराए हैं वो मिलावट के गोरखधंधे के सामने महज औपचारिकता हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मथुरा में हर साल 1.31 करोड़ श्रद्धालुओं का आगमन होता है। इसमें बड़ी संख्या गोवर्धन में दूध की धार की परिक्रमा करने वालों की है। इन श्रद्धालुओं को ही साफ्ट टारगेट बनाकर मिलावट का दूध, खोआ से बनी मिठाई, मिस ब्रांड खाद्य पदार्थ और एक्सपायर्ड पदार्थों को खपाया जाता है।