श्रीराधारानी की जन्मस्थली बरसाना में वसंत पंचमी से 40 दिवसीय होली की शुरुआत डांढ़ा गढ़ने के साथ हो जाती है। उसी दिन से समाज गायन का दौर शुरू हो जाता है। इसके लिए प्रयोग में लाई जाने वाली पोथी (पुस्तक) 445 वर्ष पुरानी है। इसमें वर्ष भर के उत्सवों का संकलन है। समाज गायन की परंपरा भी इतनी ही पुरानी मानी जाती है।
बरसाना में समाज गायन की शुरुआत करने वाले दक्षिण में मदुरैपट्टनम के श्रीवत्स गोत्रिय तैलंग ब्राह्मण भाष्कर भट्ट के यहां जन्मे नारायण के अवतार श्रीनारायण भट्ट ने की। संवत् 1602 में नारायण भट्ट ब्रज में आए। यहां उन्होंने ब्रज को प्राकट्य करने के साथ-साथ समाज गायन में गाए जाने वाले पदों का भी संकलन किया।
ब्रज भूमि लुप्त हो चुकी थी, 16वीं सदी में ब्रज के पुनरोत्थान का दौर जारी था। स्वामी हरिदास, नारायण भट्ट, गोस्वामी हित हरिवंश, चैतन्य महाप्रभु, महाप्रभु वल्लभाचार्य यहां आए। ब्रज की लीलाओं को प्रकाशित किया। उन्हीं में से अलग-अलग वैष्णवों के संप्रदाय के द्रष्टिकोण के हिसाब से समाज गायन की पोथियां विकसित हुईं।
देवालयों में विकसित हुआ समाज गायन
देवालय पद्धति के अनुसार समाज गायन के मध्य भाग में जो बैठता है उसे समाज का मुखिया कहते हैं। समाज की पोथी में से पहले मुखिया गायन करता है, उनके पीछे अनुसरण करने वालों को झेला बोलते हैं। पखावजी पखावज बजाते हैं। वल्लभ कुल के वैष्णव संप्रदाय में समाज गायन को कीर्तन बोला जाता है। उनकी पोथियों में भगवान की बाल लीलाओं का वर्णन सुनने को मिलता है।
समाज की पोथी को बोलते हैं वर्षोत्सव की पोथी
वृंदावन शोध संस्थान के पांडुलिपि विद् राजेश शर्मा ने बताया कि पहले यह पांडुलिपियां हाथों से लिखी जाती थीं। प्रिंटिंग मशीन आने के बाद यह वर्षोत्सव छपने लगे, लेकिन परंपरागत रूप से हाथ से लिखी जाने वाली पोथी का विशेष महत्व होता है। पोथी को वर्षोत्सव की पोथी भी कहा जाता है।
447 वर्ष पहले नारायण भट्ट ने किया था श्रीजी विग्रह का प्राकट्य
राधाकृष्ण की कृपा से वह संवत् 1602 में ब्रज में आए। यहां उन्होंने देखा कि ब्रज मंडल के ग्राम, नगर, कुंड, तालाब व विग्रह सभी विलुप्त हो गए हैं। उन्हें यह देख कर बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने अपने साथ आए लाडिलेय प्रभु के साथ विलुप्त स्थलों का प्राकट्य किया।
बरसाना में श्रीजी के श्रीविग्रह का प्राकट्य संवत 1626 में भट्ट जी ने ही किया। भट्ट जी का तिरोभाव संवत् 1700 में हुआ। गोस्वामी समाज के मुखिया रामभरोसी गोस्वामी ने बताया कि हमारे बुजुर्ग बताते आ रहे हैं कि समाज गायन की पोथी 400 वर्ष से अधिक पुरानी हैं। ज्यादा पुरानी होने पर हम पोथियों को सहेज कर रखते हैं। आज भी हमारे पास पुरानी पोथियां मौजूद हैं।