नोटबंदी के बाद ठप पड़े उद्योग, कारोबारोें से अब मजदूरों की छंटनी की तैयारी की जा रही है। इधर काम न मिलने से परेशान मजदूर भी माहौल भांप कर अपने-अपने घरों की ओर जा रहे हैं।
मथुरा में साड़ी, टौंटी, निवाड़, चांदी, प्रिटिंग प्रेस का बड़ा उद्योग है। इनमें करीब 50,000 से अधिक मजदूर काम करते है। इनमें अधिकांश वो मजदूर है जो बिहार, पश्चिम बंगाल से आकर दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवारों का पालन कर रहे है।
नोटबंदी के बाद से ही ये उद्योग बंद पड़े हैं। ऐसे में दिहाड़ी मजदूरों के सामने तो रोजीरोटी का संकट खड़ा हो ही गया है वहीं कारखानों में स्थायी रूप से काम करने वाले मजदूरों पर भी छंटनी की तलवार लटकने लगी है। चांदी कारोबारी राजेंद्र अग्रवाल ने बताया कि जब काम ही नहीं होगा तो मजदूरों या कर्मचारियों का वेतन कैसे निकलेगा। ऐसे में छंटनी तय है। मथुरा में करीब 15,000 से अधिक लोगों की छंटनी का अनुमान है।
उद्योग संख्या मजदूर छंटनी की तैयारी
साड़ी 50 5,000 2,000
टोंटी 90 8,000 4,000
निवाड़ 45 4,000 1500
चांदी-गिलट 200 15,000 6,000
स्मॉल स्केल 175 10,000 1500
मंडियों से लौटने लगे मजदूर
धान की फसल पर मंडियों में मजदूरी करने के लिए बिहार से करीब दस हजार मजदूर आए थे। ये मथुरा, कोसीकलां, राया, गोवर्धन की मंडियों में मजदूरी करते हैं। लेकिन नोटबंदी के बाद दो बार मंडियों में हड़ताल हो चुकी है। इसके बाद भी ठीक से आवक नहीं हो रही है। इसके चलते मजदूर अपने घरों की ओर वापस जाना शुरू हो गए हैं।