दो दशक पहले तक मथुरा स्केप और राल ड्रेेन यमुना के लिए जीवन दायिनी का काम करती थीं। अपर आगरा कैनाल से आने वाला सिंचाई का पानी राल ड्रेन और मथुरा स्केप से यमुना में पहुंच जाता था। इससे यमुना के जल स्तर में इजाफा होता था। इस पानी में कहीं भी गंदगी नहीं थी, लेकिन वर्ष 2000 से प्रभावी हुआ यमुना कार्य योजना का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और सीवेज पंपिंग स्टेशन के संचालन ने यमुना का वर्षों पुराना खेल बिगाड़ दिया।
एसटीपी और एसपीएस का डिजायन करने वाली कार्यदायी संस्था जल निगम ने सरस्वती कुंड पर राल ड्रेन और मथुरा स्केप में ही मसानी नाले को जोड़ दिया। इससे राल ड्रेन और मथुरा स्केप में सिंचाई के लिए आने वाला पानी मसानी नाले की गंदगी के साथ यमुना में समाहित होने लगा। जल निगम की यही लापरवाही अब यमुना को प्रदूषण मुक्त करने की प्रक्रिया में बड़ा रोड़ा बन गई है। अब जब भी राल ड्रेन उफनती है, नाले में भरी सिल्ट सीधे यमुना में समाहित हो जाती है। जानकारों का कहना है कि मसानी नाले पर राल ड्रेन और नाले को अलग-अलग कर दिया जाए तो यह समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। इस हकीकत को डीएम के समक्ष रखने की हिम्मत सिंचाई अधिकारी भी नहीं जुटा पा रहे हैं। इसका खामियाजा यमुना प्रदूषण मुक्ति अभियान को भुगतना पड़ रहा है।
यमुना रक्षक दल की बैठक आज
यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय कार्यकर्ताओें की बैठक शुक्रवार को गोविंद मठ में होगी। इसमें 11 मार्च 2015 से होने वाले मथुरा से दिल्ली तक पदयात्रा के विषय में विचार विमर्श किया जाएगा। आगरा से दिल्ली तक हाईटेक कार्यालय खोलें जाएंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम, रासलीला, कीर्तन, नाट्य कार्यक्रमों पर भी जोर दिया जाएगा। महासचिव रमेश सिसौदिया ने बताया कि इस पदयात्रा में कई कालेज, स्कूलों के छात्र-छात्राएं भी भाग लेंगे। यमुना की धारा को पावन करने के लिए 11 मार्च को दो लाख लोग पैदल पदयात्रा कर 21 मार्च को दिल्ली जंतर-मंतर पहुंचेंगे। वहां केंद्र सरकार के समक्ष समस्त यमुना के मुद्दे रखे जाएंगे।