श्रीराधारानी ब्रज चौरासी कोस यात्रा मंगलवार को भांडीरवन और वंशीवट से चल कर मांट होते हुए यमुना किनारे स्थित महालक्ष्मी मंदिर बेलवन पहुंची। इस दौरान पदयात्रियों का जगह-जगह स्वागत किया गया।
महालक्ष्मी की तपोस्थली बेलवन में यात्रा पहुंची तो राधे-राधे के जयकारों से वातावरण गूंज उठा।
मंगलवार तड़के सवा छह बजे यात्रा मांट होते हुए निकली। बेलवन पहुंचते ही सभी यात्रियों ने दीपावली पर्व होने के चलते महालक्ष्मी के दर्शन कर मनौती मांगी।
शाम के समय संत रमेश बाबा ने बताया कि यमुना किनारे लक्ष्मीजी राधा माधव के रासरस की प्राप्ति के लिए तपस्या कर रहीं हैं। उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के बिना यमुना का उद्धार कैसे संभव है, इसलिए यमुना को लाने के हर संभव प्रयास किए जाएंगे।
यात्रा में सुनील सिंह, राधाकांत शास्त्री, रामजीलाल, प्रेमप्रकाश, लाल बाबा, रूप मंजरी, ब्रजेश, निहाल सिंह आदि मौजूद रहे।
बेलवन में आज भी तपस्या कर रहीं महालक्ष्मी
मांट। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण मांट के निकटवर्ती वन बेलवन में रास रचाते थे। एक बार जब भगवान वहां रास रचाने आए, उन्होंने बांसुरी बजाई तो आवाज देवलोक और स्वर्गलोक तक पहुंची।
महालक्ष्मी ने नारदजी से पूछा कि यह आवाज कैसी है? नारद जी बोले कि बेलवन में भगवान श्रीकृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं। महालक्ष्मी बेलवन में आ गईं और रास में प्रवेश करना चाहा पर वहां पर मौजूद गोपियों ने उन्हें रोक दिया, तो महालक्ष्मी ने गोपियों को भला-बुरा कह डाला।
भगवान को बुरा लगा और उन्होंने महालक्ष्मी से कहा कि यह साधारण गोपियां नहीं हैं। इन गोपियों ने हजारों वर्ष तपस्या कर रास में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त किया है।
यदि आपको रास में शामिल होना है तो पहले हजारों वर्ष तपस्या कर गोपियों को प्रसन्न करना होगा तब आपको रास में शामिल करेंगे। मान्यता है कि तभी से महालक्ष्मीजी यहां गोपी रूप में तपस्या कर लोगों की मनोकामना पूर्ण कर रहीं हैं।