मथुरा। चित्रकूट में लीलामंच पर भरत मनावन व पादुका दान लीला का मार्मिक व हृदयस्पर्शी मंचन देख भक्तों के हृदय द्रवित हो गया। रामलीला में भाई राम से वन में मिलने जाने के लिए भरत व शत्रुघ्न की सवारी गोविंद गंज से प्रारंभ होकर लाल दरवाजा पहुुंची। वहां निशादराज से भेंट के बाद चित्रकूट पहुंचे।
भीलों ने प्रभु राम को चतुरंगिणी सेना के साथ आगमन की सूचना दी जाती है। लक्ष्मण क्रोधित होते हुए इसे भरत शत्रुघ्न का सेना के साथ आना कुचक्र बताते हैं। राम समझाते हैं कि भरत को कभी भी राज्य मद नहीं हो सकता। श्री राम के समक्ष पहुंचने पर भरत पाहिमाम्-पाहिमाम् कहते हुये पृथ्वी पर साश्टांग दंडवत करके चरणों में गिर पड़ते हैं। इस दौरान भावपूर्ण मिलन होता है। भरतजी की ओर से मुनि वशिष्ठ प्रस्ताव रखते हैं कि आप अयोध्या वापस लौट कर राजगद्दी को शोभायमान करें।
श्रीराम पिता की आज्ञा का अनुपालन करने की बात कहते हैं। प्रभु श्री राम की पादुका को भरतजी अपने मस्तक पर धारण कर अयोध्या लौट जाते हैं। इस मौके पर लीला में रविकांत गर्ग, सभापति जयंती प्रसाद अग्रवाल, उपसभापति जुगल किशोर अग्रवाल, नंदकिशोर अग्रवाल, प्रधानमंत्री मूलचंद गर्ग, प्रदीप कुमार सर्राफ, शैलेश अग्रवाल, पंउ शशांक पाठक, कैलाश चंद गुप्ता, अजयकांत गर्ग, बॉकेबिहारी, सुरेंद्र शर्मा खौना, प्रदीप गोस्वामी, राजनारयाण गौड़, नगेंद्र मोहन मित्तल, रविप्रकाश थे।