मथुरा। चैत्र नवरात्र में मातारानी के पांचवें स्वरूप मां स्कंद माता की श्रद्धाभाव के साथ आराधना की गई। घरों से लेकर मंदिरों तक मां दुर्गा के स्कंद स्वरूप का पूजन जयकारों के बीच होता रहा। भोर से लेकर देर रात तक भक्तों में उत्साह का संचार रहा।
कैंट काली मंदिर, चामुंडा देवी मंदिरों के साथ ही अन्य देवालयों में श्रद्धालुओं ने फूल बंगले की झांकी के दर्शन किए। चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है, मैं बालक तू माता शेरावली है, भक्ति का दे दो वरदान मेरी मां, बिगड़ी मेरी बना दे जैसे भजनों से मंदिरों में वातावरण आनंदमय होता रहा।
नवरात्र में घर-घर मां का कलश सजाया गया है। मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद कुछ भक्तों ने भंडारे का आयोजन किया तो किसी ने माता रानी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर रोट चढ़ाया। मंदिरों में देर शाम तक महिला श्रद्धालु माता रानी के भेंट गाकर उनका गुणगान कर रही हैं। संवाद
महाविद्या देवी मंदिर में हुआ था श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार
महाविद्या देवी मंदिर का इतिहास कई वर्षों पुराना है। पौराणिक मान्यता है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार हुआ है। मंदिर के सेवायत बाल कृष्ण चतुर्वेदी बताते हैं कि श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंद में इसका प्रमाण मिलता है।
उन्होंने बताया कि मुगल शासनकाल में जीर्णशीर्ण हुए इस मंदिर को सन 1616 में क्षत्रपति महाराजा शिवाजी ने नया स्वरूप दिया। ब्रज चौरासी कोस और मथुरा पंचकोसीय परिक्रमा मार्ग स्थित महाविद्या में देवी मंदिर के साथ कई ऐतिहासिक और रोचक पहलु जुड़े हैं।
इस मंदिर को द्वापर काल का बताया जाता है। महाविद्या देवी को श्रीकृष्ण की कुलदेवी बताया जाता है। इस स्थल को अंबिका वन के नाम से भी जाना जाता है। एक साल के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इसी वन में शरण ली थी। वर्तमान में मंदिर के साथ कुंड भी स्थित है।