कस्बे के उत्साही युवाओं और हुरियारनों की टोलियों ने गली-मोहल्लों में जमकर मस्ती की। होली के शौकीनों ने इस उत्सव के लिए दो दिन पहले ही ट्रैक्टर-ट्रॉली और बुग्गियों से मिट्टी लाकर चौराहों पर ढे़र लगा दिए थे। परंपरा के अनुसार, पुरुषों को पकड़कर मिट्टी के गारे में सराबोर करने के बाद मोहल्ले की महिलाओं को भी टोलियां बनाकर लाया गया और उन्हें कीचड़ व मिट्टी के इस उल्लास में शामिल किया गया।
इस दौरान हुरियारों ने एक-दूसरे के कपड़े फाड़कर अपनी खुशी का इजहार किया। स्थानीय निवासी शिक्षाविद् मोरध्वज अग्रवाल, प्रधान प्रशांत गुप्ता,मनीष जिंदल, उमाकांत शर्मा, शिक्षाविद् सुरेश चौधरी और शिक्षक विवेक अग्रवाल ने बताया कि यह परंपरा त्रेतायुग से जुड़ी है। माना जाता है कि जब होलिका जल गई और भक्त प्रहलाद सुरक्षित बच गए, तब लोगों ने खुशी में होलिका की राख एक-दूसरे पर उड़ाई थी, जो कालांतर में पानी के साथ मिलकर कीचड़ की होली के रूप में बदल गई।
कीचड़ से 'मिट्टी होली' की ओर बढ़ा रुझान
आधुनिकता के इस दौर में अब नौहझील की यह प्रसिद्ध कीचड़ होली धीरे-धीरे 'मिट्टी होली' के रूप में परिवर्तित होती दिख रही है। लोगों में बढ़ती जागरूकता के कारण अब गंदगी या नाली के कीचड़ के बजाय साफ मिट्टी और पानी से गारा तैयार कर होली खेलना अधिक पसंद किया जा रहा है। जहां पहले कीचड़ से लोग बचते थे, वहीं अब मिट्टी के गारे में सराबोर होने के लिए हर कोई लालायित नजर आता है। इस आयोजन में मुख्य रूप से हेमंत उर्फ बिट्टू जिंदल, दिनेश प्रधान, कन्हैया गुप्ता, पवन अग्रवाल, नीरज कुमार, डॉ. वीर राजपूत सिंह, मुकेश चाहर सहित रवि और हिमांशु अग्रवाल जैसे गणमान्य लोग उत्साहपूर्वक शामिल रहे।