छाता। बंद पड़ी छाता चीनी मिल को पुन: चालू कराने की मांग को लेकर भूतपूर्व सैनिक परिषद और किसानों का धरना 44वें दिन और उग्र हो गया। बृहस्पतिवार को पूर्व चेयरमैन जगपाल चौधरी के नेतृत्व में सर्व-समाज (36 बिरादरियों) के समर्थन में उतरने से आंदोलन को नई ऊर्जा मिल गई है।
धरना स्थल पर हुंकार भरते हुए जगपाल चौधरी ने क्षेत्रीय मंत्री और जनप्रतिनिधियों की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मंत्री आखिर इस लंबित समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाल रहे हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि एथेनॉल प्लांट के नाम पर सरकार पर्दे के पीछे कुछ छिपा रही है। उन्होंने सवाल दागा कि चीनी मिल की कीमती जमीन का इस्तेमाल किसके फायदे के लिए किया जा रहा है और इसके पीछे किसकी व्यावसायिक भूमिका है?36 बिरादरियों का समर्थन मिलने के बाद आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी कि जब तक मिल को चलाने का ठोस आश्वासन नहीं मिलता, आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
इस अवसर पर दिगंबर चौधरी, जसवंत प्रधान, पूर्व चेयरमैन राजपाल सिंह, हीरा चौधरी, शरमन चौधरी, श्यामू लंबरदार, ओमप्रकाश, गंगाराम, गिर्राज, परसोती, नारायण सिंह, चेतन कृष्ण, धनंजय सिंह, हरिश्चंद, तेज सिंह और परसोत्तम वकील सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। वहीं बुखरारी गांव से सैकड़ों ग्रामीण ढोल-नगाड़ों के साथ धरना स्थल पहुंचे, जिससे आंदोलनकारियों में नया जोश भर गया। जय जवान, जय किसान के गगनभेदी नारों के बीच किसान नेताओं ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया, तो आंदोलन और उग्र होगा। इस दौरान अमर सिंह, किशोरी सिंह जादौन, गजेंद्र बोहरे, कान्हा पूर्व प्रधान, शेरपाल, ब्रजराज, जोगिंदर, सतीश लंबरदार और हरिओम सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
योगी बाबा, हमारी छाता चीनी मिल चलवा दीजिए...
छाता। ‘योगी बाबा, हमारी छाता चीनी मिल चलवा दीजिए...’ 6 वर्ष की नन्हीं दिव्या तिवारी ने जब मासूमियत और उम्मीद से भरे भरे कंठ से यह शब्द कहे, तो धरना स्थल पर मौजूद हर बुजुर्ग किसान और आंदोलनकारी की आंखें नम हो गईं।
लंबे समय से बंद पड़ी छाता चीनी मिल को पुनर्जीवित करने की मांग को लेकर जारी लड़ाई अब सिर्फ किसानों की नहीं, बल्कि बच्चों की भी भावना बन चुकी है। दिव्या की इस भावुक पुकार का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। अपनी बाल-सुलभ आवाज़ में उसने क्षेत्र के उस दर्द को बयां कर दिया, जिसे किसान बीते कई सालों से झेल रहे हैं। मिल बंद होने से थम चुकी क्षेत्र की आर्थिक रफ्तार और रोजी-रोटी के संकट को एक मासूम ने अपनी दो पंक्तियों में समेट दिया।