यतेंद्र तिवारी
नंदगांव (मथुरा)। आज दुनिया जब मातृत्व का उत्सव मना रही है, तब एक सवाल बार-बार गूंजता है, मां कौन होती है? जन्म देने वाली या जीवन संवारने वाली? इसी सवाल का उत्तर हजारों साल पहले ब्रज की गलियों में मिल चुका था, जहां एक गोपिनंदिनी ने नन्हे कान्हा को अपने आंचल में ऐसा ढका कि ईश्वर भी मां कहकर रो पड़े।
कृष्ण भले ही देवकी के गर्भ से जन्मे थे, लेकिन यशोदा मैया ने उन्हें गोद में खिलाकर मां शब्द की परिभाषा को नया अर्थ दिया। उन्होंने भगवान को झूला झुलाया, डांटा, पिटाई भी की, और माखन चुराते पकड़ा, मिट्टी खाते पकड़ा तो रस्सी से भी बांधा। उस वक्त उन्हें क्या पता था कि वह जिसे रस्सी में बांध रही हैं, वह अनंत स्वामी हैं। भगवान कृष्ण ने अपना ब्रह्मांडीय स्वरूप दिखाया, तब यशोदा मैया की आंखों में डर दिखाई था।
यह उस मां का डर था कि कहीं मेरा बच्चा खो न जाए। यह दृश्य केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि हर उस मां की व्यथा है जो अपने बच्चे को दिन-ब-दिन बड़ा होते हुए देखती है। हर वक्त उसके लिए चिंतित रहती है। आज समाज में कई बच्चे अनाथ हैं तो कई महिलाएं मां बनने की राह में संघर्ष कर रही हैं लेकिन यशोदा मैया की कहानी हमें सिखाती है कि मां वह नहीं जो केवल जन्म दे, मां वह है जो अपनाए। आज हर वह महिला जो किसी को प्यार देती है, संवारती है, सिखाती है, वह यशोदा है। संवाद
मदर्स डे पर यशोदा मैया को क्यों याद करना जरूरी है
कथावाचक आचार्य युगल किशोर बताते हैं कि नंदरानी यशोदा मैया मातृत्व का वह चेहरा हैं जो बिना किसी अपेक्षा के जीता है। उन्होंने कृष्ण से कभी कुछ नहीं मांगा। न आशीर्वाद, न प्रसिद्धि। उनका प्रेम निस्वार्थ था और यही आज के युग की सबसे बड़ी जरूरत है। दुनिया बदल रही है, रिश्तों में दूरी बढ़ रही है, तो यशोदा हमें बताती हैं कि एक मां की ताकत उसकी ममता में है, न कि अधिकार में। बच्चों को समझना, उनके साथ भावनात्मक रिश्ता बनाना और बिना शर्त उन्हें अपनाना। यही है सच्चा मातृत्व।