जयगुरुदेव नामयोग साधना मंदिर में 67वां वार्षिक मेला प्रार्थना, ध्यान, भजन और सत्संग के साथ 18 दिसंबर से आरंभ हो गया। मेले में पहले दिन आध्यात्मिक सत्संग, प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम हुए।
पांच दिवसीय सत्संग-मेला के पहले दिन राष्ट्रीय उपदेशक सतीश चन्द्र और डाक्टर करुणाकान्त ने प्रवचन किए। शुक्रवार को सुबह सत्संग प्रवचन में डा. करुणाकान्त ने कहा कि मौत का समय निश्चित है। सांसें अनमोल हैं। जीवन का सारा खेल सांसों पर ही निर्भर है। इसलिए नेक कर्म करने वाले दीर्घायु और बुरे कर्म करने वाले अल्पायु हो जाते हैं। ईश्वर ने जितनी आजादी इंसानों को दी है, उतनी आजादी उनके पास नहीं है। मृत्युलोक में मनुष्य शरीर सर्वश्रेष्ठ है और यह बडे़ भाग्य से मिलता है। इसी से साधना करके प्रभु के पास जीवात्मा को पहुंचाया जाता है। इसके लिए संत सतगुरु की खोज करनी पड़ती है।
शाम को सत्संग में सतीश चन्द्र ने प्रवचन करते हुए कहा कि धरती पर संत-महापुरुष जीवों को जन्ममरण के बंधन से मुक्त करने के लिए आते हैं। उनकी रूहानी शिक्षा सारे मानव जाति के लिए है। वे किसी व्यवस्था को बिगाड़ने के बजाए समाज से अंधविश्वास और कुरीतियों को दूर कराते हैं। इससे लोगों को जीवन में अधिक सुख और शांति प्राप्त हो सकती है। बाबा जयगुरुदेव महाराज अपने गुरु के आदेश के पालन में 116 वर्ष तक जीवों के कल्याण के लिए शाकाहार अपनाने और नशा मुक्त समाज बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। उन्हाेंने लोगों को सुरत-शब्द योग साधना का भेद बताया। बाबा ने अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का कभी भेदभाव नहीं किया। सभी के यहां खाना खाया, पानी पिया और सबको प्यार दिया। दूसरी ओर मेले के मुख्य कार्यक्रम की तैयारियां जोरों पर हैं। जिलों में विचार और सत्संग गोष्ठियों का भी दौर चल रहा है। श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है।