पीड़ित प्रमोद शर्मा का दर्द उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। उन्होंने बताया कि उन्होंने कर्ज लेकर मकान बनाया था और किसी तरह परिवार का पेट पाल रहे थे। अब उनके पास न मकान है और न ही परिवार का पेट भरने के लिए भोजन। सभी पीड़ितों का कहना साफ है कि वे जहां रहते थे, उन्हें वहीं बसाया जाए। किसी भी हाल में वे वृंदावन के डूडा आवासों में रहने के लिए तैयार नहीं हैं।
किराया नहीं तो कैसे जाएं वृंदावन
पीड़ित ललिता का कहना है कि उनके पास खाने के लिए भी रुपये नहीं हैं। अधिकांश परिवार मथुरा में ही कोई न कोई काम करते हैं। ऐसे में वे वृंदावन से मथुरा तक का किराया कहां से लाएं। साथ ही यह भी बताया कि डूडा के आवासों में न खिड़कीं हैं न दरवाजे, ऐसे में उनकी सुरक्षा को भी खतरा है। पीड़ितों में अधिकांश परिवार चांदी कारीगर हैं, इसके लिए सुरक्षा बेहद जरूरी है। प्रशासन द्वारा मदद किए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि दोपहर एक बजे तक प्रशासन ने चाय तक की व्यवस्था नहीं की है, ऐसे में प्रशासन से क्या ही उम्मीद करें।
टूट गए डूडा आवासों के ताल, निकाल लिया कूलर
पीड़ित प्रमोद और राकेश ने बताया कि डूडा आवासों में उन्होंने अपना कुछ सामान रखा था। उन्हें एक कूलर भी प्रशासन की ओर से दिया गया था। प्रमोद ने बताया किसी ने फोन कर कूलर वापस मांग लिया। वहीं बुधवार को जब वह डूडा आवास गए तो वहां उनका लगाया ताला तोड़कर किसी दूसरे ने अपना ताला लगा दिया। राकेश को आवंटित आवास में भी उनका ताला तोड़कर दूसरा ताला लगा मिला। हादसे के बाद जो सामान उन्होंने किसी तरह जुटाया था अब वह भी खतरे में है।
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