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छज्जू लाये खाट के पाये, मार-मार लट्ठन झूर कर आये...

Sat, 21 Nov 2015 11:49 PM IST
ब्यूरो, अमर उजला मथुरा
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गौरतलब रहे कि सदियों से चले आ रहे चतुर्वेदी समाज के परंपरागत कंस वध मेला की तैयारियां दिवाली के साथ ही शुरू हो जाती हैं। इस आयोजन में शामिल होने के लिए चतुर्वेदी समाज के लोग देश विदेश से मथुरा आ जाते हैं।

शनिवार को मेले को लेकर एक बार फिर अद्भुत उमंग और उल्लास का वातावरण नजर आया। दोपहर में समाज की बगीचियों में ठंडाई घुटने लग गई थी। समाज के वृद्ध और युवा इसके आनंद में सराबोर होने लगे।
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शाम होने पर कृष्ण बलराम शोभायात्रा निकाली गई। इसकी शुरुआत छत्ता बाजार स्थित ताजपुरा से हुई। इस शोभायात्रा में कृष्ण बलराम के स्वरूप के साथ विभिन्न झांकियां शामिल हुईं।

इसमें सबसे आगे भगवान गणेश की झांकी थी तो पीछे कृष्ण सुदामा, गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम के दर्शन कराती झांकी लोगों को आकर्षित करती रही। इनके अलावा शोभायात्रा में राजस्थानी कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुति दी।

चरकुला नृत्य और महारास की झांकी भी आकर्षण का केंद्र बनी। बैंडबाजों की धुन पर नाचते गाते लोग आनंद में झूमते रहे। शोभायात्रा के अंत में हाथी पर सवार कृष्ण बलराम के साथ समाज के लोग चले।

इसमें उद्योगपति दीनानाथ पाठक, माथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक महेश पाठक, दिनेश पाठक, गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, राकेश तिवारी आदि शामिल हुए।

यह शोभायात्रा शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए कंसखार पर खत्म हुई। यहां कंस के आधे धड़ को समाज के लोगों ने लाठियों से पीटा। कंस के इस धड़ को पीटते हुए कंसखार से होलीगेट और विश्रामघाट तक घसीटते हुए ले गए।

यहां यमुना में उसे समाहित करते हुए देर रात आरती का आयोजन किया गया। इस मौके पर लालाराम, बालकिशन, योगेंद्र चतुर्वेदी, कांतानाथ चतुर्वेदी, अनुराग चतुर्वेदी, अजय चतुर्वेदी, आशीष चतुर्वेदी,

विशाल आयुष, यशराज चतुर्वेदी, अभिनय चतुर्वेदी, अमित पाठक, डीएन चतुर्वेदी आदि मौजूद रहे। परिषद के संरक्षक महेश पाठक ने लोगों को स्मृति चिह्न भेंट किए।


विदेश से आए युवा...
समाज के इस आयोजन में शामिल होने के लिए ओमान से आए दिलीप चतुर्वेदी ने बताया कि मथुरा में कंस वध मेला का अद्भुत आनंद है। यह मेला चतुर्वेदी समाज के लोगों को खुद अपनी ओर खींच लेता है।

पिछले एक दशक से दुबई रह रहे अरविंद अब करीब दो साल बाद मथुरा लौटकर आए हैं। उनका कहना है कि कंस वध मेला की बात ही कुछ और है। इसमें सभी लोगों से मेल मिलाप हो जाता है।
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पिछले कई वर्षों से दुबई में रह रहे कृष्णकांत चतुर्वेदी भी इस मेला के लिए ही मथुरा आए हुए हैं। उन्होंने बताया कि वह तीन साल बाद मथुरा आए हैं। मेला की उमंग उन्हें यहां तक खींच लाई।
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