अब जवाहर बाग में कोई भी व्यक्ति आ-जा सकता है। ढाई साल तक कब्जाधारियों का भय और पिछले चार दिन से पुलिस की कड़ी पहरेदारी सोमवार को खत्म हो गई। आम लोगों ने यहां पहुंचकर पुलिस और कब्जाधारियों के बीच संघर्ष के निशां देखे।
रामवृक्ष यादव के नेतृत्व में शुरू हुए स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह की मथुरा में शुरुआत मार्च, 2014 में जवाहर बाग से हुई थी। चंद दिनों बाद ही इस स्थल के द्वार आम लोगों के लिए बंद हो गए। इसकी चारदीवारी में रहने वाले उद्यान विभाग के कर्मचारी और अधिकारियों को भी मारपीट कर खदेड़ दिया गया। कई सौ एकड़ वाले जवाहर बाग पर रामवृक्ष यादव का कब्जा हो गया।
पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के साथ मारपीट के बाद तो आम लोगों ने इस ओर जाना ही बंद कर दिया। कोई व्यक्ति किसी तरह हिम्मत जुटाकर एंट्री भी करता तो उसे अपना संपूर्ण विवरण गेट पर मौजूद रजिस्टर में अंकित करना पड़ता।
दो जून को पुलिस और रामवृक्ष यादव के नेतृत्व वाले कब्जाधारियों के बीच हुए खूनी संघर्ष ने इस भय को खत्म कर दिया, लेकिन चार दिन तक पुलिस ने जवाहर बाग में किसी को प्रवेश नहीं करने दिया। सोमवार को यह प्रतिबंध हटा दिया गया। इसकी जानकारी लगते ही लोगों ने जवाहर बाग पहुंचना शुरू कर दिया। बड़ी संख्या में लोग सोमवार को जवाहर बाग पहुंचे।
कैमरे में कैद हुए हालात
आपरेशन जवाहर बाग के दौरान आगजनी से यहां हर तरह तबाही का मंजर नजर आ रहा है। दो जून को आग की लपटों से सब कुछ जलकर खाक हो चुका है। सोमवार को यहां पहुंचे लोगों ने हालात को देखा। कब्जाधारियों की व्यवस्थाओं को देखकर आश्चर्य भी व्यक्त किया।
अखबारों के माध्यम से इस संबंध में प्राथमिक जानकारी लोगों के पास पहुंच गई थी। तो बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। यहां तीन से पांच हजार लोगों के लिए भोजन बनाने की व्यवस्था बडे़ भू-भाग में की गई थी। इसके लिए जमीन में भट्टियां मौजूद हैं।
अनेक स्थानों पर महिला और पुरुषों के कपडे़ बिखरे पडे़ हैं। कहीं नए कपडे़ पड़े हैं तो अधिकांश स्थानों पर फटे हुए कपड़े हैं। खासकर कई स्थानों पर महिलाओं की साड़ियां पड़ी हुई हैं। अनेक कपड़ों में खून लगा है। यहां पहुंच रहे लोग उजडे़ हुए जवाहर बाग को मोबाइल के कैमरे में कैद करने में जुटे हुए हैं।