‘जो रस बरस रह्यौ या ब्रज में, वो रस तीनों लोकन में नाय, संकरी गली बनी गहवर की, दधि लै चली कुंवर कीरत की, आगे गाय चलें गिरधर की, लीन्हे सखा बुलाय, जो रस...’।
श्रीद्वारिकाधीश मंदिर में होली का उल्लास अपने शिखर की ओर है। यहां ढप की थाप पर श्रद्धालु थिरक रहे हैं। सोने और चांदी की पिचकारी हाथ में लिए द्वारकानाथ भक्तों के साथ होली खेल रहे हैं। इस बीच मंदिर के मुखिया जब गुलाल उड़ाते हैं तो उसे लूटने की होड़ मच जाती है। क्या बालक और क्या बुजुर्ग हर कोई इस प्रसाद को ग्रहण कर मस्तक पर लगाने को उतावला हो जाता है।
मंदिर में होली का ये उल्लास सुबह दस बजे राजभोग की झांकी में छाने लगता है। ब्रज के होली गीत ‘आज कैसो बनो ब्रजराज रसिया होली कौ, माथे याके मोर मुकट है, कानन में याकै कुंडल माहे, याके गल मुतियन की माल रसिया होली कौ’ जैसे बोलों पर श्रद्धालु नाचते-गाते भक्ति में डूब जाते हैं।