मान्यताओं के तहत श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य सनातन गोस्वामी मानसी गंगा तट पर भजन साधना करते थे। वे प्रतिदिन गिरिराज महाराज की परिक्रमा करते थे। ब्रज भक्तमाल पुस्तक के अनुसार, सनातन गोस्वामी आषाढ़ मास की पूर्णिमा संवत 1615 में ब्रह्मलीन हुए। उनके गोलोकवासी होने पर शिष्य शोकाकुल हो गए। भक्तों ने उनकी याद में मुंडन कराया। उन्होंने पार्थिव देह के साथ गिरिराज महाराज की परिक्रमा लगाई।
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आषाढ़ पूर्णिमा के दिन शिष्यों ने शोक प्रकट किया। तभी से इस पूर्णिमा को मुड़िया पूर्णिमा कहा जाने लगा। आज देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालु गिरिराज प्रभु की भक्ति से जुड़ गए हैं। मुड़िया पूर्णिमा मेले का इतिहास 469 साल पुराना है। यह परंपरा सनातन गोस्वामी के शिष्यों द्वारा शुरू की गई थी। इसी भक्ति को जोड़ते हुए वैष्णव भक्त आज भी गिरिराज की परिक्रमा करते हैं।
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शोभायात्रा की तैयारियां पूरी
इस बार मुड़िया शोभायात्रा 29 जुलाई को दो चरणों में निकलेगी। सुबह नौ बजे राधाश्याम सुंदर मंदिर से महंत रामकृष्ण दास के निर्देशन में शोभायात्रा शुरू होगी। जबकि शाम पांच बजे श्रीचैतन्य महाप्रभु मंदिर से महंत गोपाल दास के निर्देशन में दूसरी शोभायात्रा निकाली जाएगी। प्राचीन परंपरा के तहत, श्रीपाद रघुनाथ दास गोस्वामी गद्दी राधाकुंड से ध्वजा और निशान चिह्न श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु मंदिर लाए जाते हैं। मुड़िया संत 27 जुलाई को मुंडन कराएंगे।
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