हिंदी को स्थापित करने में ब्रजभाषा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अकबर और उसके बाद के मुगल बादशाहों के काव्य भी ब्रजभाषा में देखे जा सकते हैं। आज हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है लेकिन एक जमाने में व्यक्ति के शिक्षित होने का आधार उसका ब्रजभाषा ज्ञान ही हुआ करता था। ब्रज संस्कृति अध्येता प्रगति शर्मा ब्रज के देवालयों की कला एवं परंपराओं के अंतर्गत विकसित दुर्लभ शब्दावली का कोश तैयार कर रही हैं। उन्होंने धीओ-धीओ, सवादी, सूचकगान, चांचरि, समाजी, मुखिया, झेला, चाव, दधिकांधा जैसे अनेक शब्दों के संकलन के साथ प्राचीन पांडुलिपियों एवं दस्तावेजों से इनके संदर्भ भी एकत्र किए हैं।
प्रगति शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि ब्रज की देवालयी संस्कृति में प्रचलित इन शब्दों पर अभी तक कोई कार्य प्रकाश में नहीं आया है। आज भी यह मंदिर-देवालयों की अपनी कूट-शब्दावलियों की भांति वाचिक (बोलचाल में) परंपरा में ही विद्यमान है। यहां कला परंपराओं के रूप में सांझी एवं फूल बंगला बनाए जाने के दौरान चस, जाल, ठाठ, चीप, वृन्दावनी, हथिनी, हौद, कैंड़ा, पछेली, आले की बेल और अंटे की बेल जैसे शब्द भी प्रयोग में आते देखे जा सकते हैं। ऐसे शब्दों का संकलन वह तैयार कर रही है। इसके लिए उन्हें संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के अनुभाग सीसीआरटी ने फेलोशिप के साक्षात्कार के लिए बुलाया है।
मंदिर-देवालयों की रही है महत्वपूर्ण भूमिका
वृंदावन। हिंदी के आरंभिक दौर व ब्रजभाषा के पल्लवन एवं विकास में ब्रज के मंदिर-देवालयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वल्लभ कुल संप्रदाय के अंतर्गत अष्टछाप के भक्त कवियों जैसे सूरदास, परमानंद दास आदि की रचनाएं हों या राधावल्लभ संप्रदाय, निम्बार्क, हरिदासी एवं ललित जैसे वैष्णव संप्रदायों के द्वारा रचित ब्रजभाषा साहित्य ने वर्तमान हिंदी के धरातल को सुदृढ़ किया।
अतीत के विश्वविद्यालय हैं ब्रज के मंदिर देवालय
शोधार्थी प्रगति शर्मा का कहना है कि ब्रज के मंदिर देवालयों ने सैकड़ों वर्ष पूर्व आज के विश्वविद्यालयों की तरह ही कार्य किया। यह बात चाहे कला-परंपराओं की हो या साहित्य सृजन की, इन सभी पक्षों को यहां की देवालयी संस्कृति ने पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रखा। हिंदी की जड़ों को समृद्ध करने के लिए वर्तमान में ऐसे आधारभूत कार्यों की आवश्यकता है।