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हीमोफीलिया: जिले में 60 मरीज, इलाज की सुविधा नहीं

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मथुरा। शरीर पर एक मामूली सा कट लगना सामान्य बात हो सकती है, लेकिन हीमोफीलिया से ग्रसित व्यक्ति के लिए यह जानलेवा साबित हो सकता है। जिले में भी इस बीमारी से पीड़ित मरीज हैं, लेकिन इलाज की सुविधा नहीं है। इस बीमारी में लगाया जाने वाला फैक्टर इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है। मरीजों को आगरा और दिल्ली जाना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इसके इलाज की सुविधा जिले में नहीं है।
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हीमोफीलिया एक आनुवंशिक बीमारी है। जिसमें शरीर में रक्त के थक्के जमने की क्षमता कम हो जाती है। जिले में करीब 60 मरीज इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर सुविधा न होने के कारण स्थिति जटिल हो गई है। सेवा संकल्प स्वास्थ्य ट्रस्ट के सचिव शेरपाल सिंह ने बताया कि जिले के 60 मरीजों में से अधिकांश गंभीर हैं। जिला स्तर पर हीमोफीलिया के लिए आवश्यक फैक्टर उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर स्थिति में मरीजों को आगरा, दिल्ली या अन्य राज्यों की ओर दौड़ना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर और दिव्यांग मरीजों के लिए यह सफर जानलेवा साबित हो रहा है। ट्रस्ट ने सरकार से मांग की है कि जिले में हीमोफीलिया वार्ड और आवश्यक इंजेक्शनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी और मरीज की जान न जाए। क्या है हीमोफीलिया: हीमोफीलिया एक अनुवांशिक (जेनेटिक) विकार है, जिसमें शरीर में रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। सामान्य चोट लगने पर भी खून का बहाव नहीं रुकता, जो जानलेवा साबित हो सकता है।

लक्षण: शरीर पर नीले निशान पड़ना, जोड़ों में अचानक सूजन और असहनीय दर्द, दांत टूटने या सर्जरी के बाद लगातार खून बहना और बिना कारण नाक से खून आना इसके प्रमुख लक्षण हैं।
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बचाव: चूंकि यह अनुवांशिक है, इसलिए विवाह से पहले काउंसलिंग और गर्भधारण के दौरान जांच जरूरी है। मरीजों को भारी व्यायाम या ऐसी गतिविधियों से बचना चाहिए जिससे चोट लगने का डर हो।
उपचार: इसका कोई स्थाई इलाज नहीं है, लेकिन फैक्टर रिप्लेसमेंट थेरेपी के जरिए इसे नियंत्रित किया जाता है। मरीज के शरीर में जिस थक्का जमाने वाले तत्व (फैक्टर 8 या 9) की कमी होती है, उसे इंजेक्शन के जरिए बाहर से दिया जाता है।
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यह आनुवंशिक बीमारी है। स्थानीय स्तर पर उपचार की सुविधा नहीं है। मरीजों को आगरा या दिल्ली रेफर किया जाता है। -डॉ. राधावल्लभ, सीएमओ मथुरा
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