डा. करुणाकांत ने सत्संग में नाम योग साधना और गुरु की अनिवार्यता पर
दोबारा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सतयुग में सब योग साधना से मोक्ष
प्राप्त कर लेते थे। त्रेता में यज्ञ के द्वारा अपने कर्मों को प्रभु पर
समर्पित करके भवसागर पार होते थे।
द्वापर में मूर्ति पूजा की विधि और
मंत्रों के आह्वान द्वारा सदगति प्राप्त करते थे। कलियुग में आयु की
क्षीणता, मन की कमजोर शक्ति, प्राणों की स्थिति आदि के कारण महापुरुषों ने
नामयोग साधना अर्थात सुरत-शब्द योग का मार्ग खोला।
सायंकालीन सत्संग
में समापन के मौके पर सतीश चंद्र ने कहा कि आपको गुरु महाराज ने जो विद्या
सिखाई है, उसे विधि पूर्वक अभ्यास करते रहेंगे तो ज्योति जलने में देर नहीं
होगी।
उन्होंने दोबारा 17-18 अक्तूबर को लखनऊ के स्मृति उपवन में आयोजित
होने वाले शाकाहार-सदाचार सत्संग महासम्मेलन में भाग लेने और उसको सफल
बनाने की प्रार्थना की। संस्था के पंकज बाबा ने गुरु महराज की दया, कृपा से
पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने पर आम नागरिकों, गुरुभक्तों, ब्रजवासियों,
धर्माचार्यों, पंडा-पुजारियों, व्यापारियों और प्रशासनिक
अधिकारी-कर्मचारियों को सहयोग करने के लिए धन्यवाद दिया है।