किशन सिंह पैर से लाचार लेकिन हौसले के धनी थे। एक दिन पत्नी से बात करते-करते बोले कि इस बार खेतों में खूब पसीना बहाया है। अब देखना फसल कटते ही नाती का इलाज बड़े अस्पताल में कराऊंगा।
लेकिन 17 मार्च के दिन किसान के परिवार के सारे अरमान बारिश ने धो दिए। बरसात के बाद खेत देखने के गए किशन सिंह का तो दिल ही बैठ गया। घर लौट कर आए तो गुुमसुम होकर ऐसे सोए कि दोबारा आंख नहीं खोली। फसल तो गई ही, उसके भरोसे घर चलाने वाला भी चला गया।
रीढ़ की हड्डी में परेशानी झेल रहे नाती का इलाज अब दादी के लिए चिंता का विषय है, वहीं खेती के भरोसे चल रहे परिवार की बरसती आंखों में भविष्य धुंधला है।
बुधवार को जब अमर उजाला की टीम ने किशन सिंह के घर दस्तक दी तो माहौल आंखें नम करने वाला था। आंसुओं का समुंदर लिए बैठी पत्नी प्रेमवती की निगाहें हर आहट पर दरवाजे की ओर जातीं। सोचतीं कोई सरकारी मुलाजिम फसल का मुआवजा लेकर आया है लेकिन हर बार उनके हिस्से में नाउम्मीदी ही आती रही।
प्रेमवती ने बताया 17 मार्च को उनके पति बरसात से बर्बाद हुई फसल को देखकर सदमे में आ गए थे। उनकी मौत के बाद अब खाने के लाले हैं। यह गांववालों की दरियादिली है कि घर में चूल्हा जल रहा है लेकिन ऐसा कब तक चलेेगा ये सोचकर दिल बैठा जा रहा है। सरकारी मदद की तो अब सपना लग रही है। पति की मौत को 23 दिन हो गए, अभी तक न कोई अधिकारी आया है न ही किसी नेता ने सुध ली है।
कर्ज में बिक गया दो बीघा खेत
किशन सिंह के खेत में रजबहा का पानी नहीं पहुंच पाता। जमीन का पानी तैलीय होने से फसल अच्छी नहीं होती। बच्चों की शादी और अन्य खर्चों में किशन सिंह पर बैंक का तीन लाख रुपये से अधिक का कर्ज हो गया था। इसके अलावा कुछ रुपये ब्याज पर भी लिए थे। जिसे 10 महीने पहले दो बीघा खेत बेच कर चुकाया था।
नवजात का इलाज बड़ी चिंता
किशन सिंह के पुत्र धर्मपाल ने बताया कि उनके एक माह के पुत्र की रीढ़ की हड्डी में जन्म ही फोड़ा था। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने दिल्ली में इलाज कराने के लिए कहा। पिताजी सोच रहे थे कि फसल बेच कर इलाज कराएंगे। अब यह एक सवाल बन गया है। किशन सिंह के परिवार में पांच पुत्र और दो पुत्रियां हैं। परिवार के लिए खेती ही आय का एकमात्र साधन है।