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अब होली के रंगों में नहीं रही चोबा, अगरू और अरगजा की महक

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मथुरा। वृंदावन के श्रीराधावल्लभ मंदिर में श्रद्घालुओं पर रंग डालते सेवायत। फाइल फोटो - फोटो : VRINDAVAN
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वृंदावन (मथुरा)। कभी ब्रज में ठाकुर जी के साथ खेले जाने वाली होली के रंगों में चोबा, अगरू, अरगजा, कुमकुमा और टेसू के फूलों की खुशबू से मंदिर प्रांगण महकते थे लेकिन बदलते समय के साथ 40 दिवसीय ब्रज की होली के वर्तमान महोत्सव में यह प्राकृतिक रंग मंदिर ही नहीं आम जनजीवन से भी ओझल हो गए हैं।
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ब्रज की होली का आकर्षण देश ही नहीं दुनिया में देेखने को मिलता है। ब्रज की होली की यह ख्याति सदियों से है। स्वर्ग बैकुंठ में होरी जो नांहि, तो कहा करैं लै कोरी ठकुराई...किशनगढ़ रियासत के महाराज नागरीदास का यह पद ब्रज की होली के इस प्राचीन वैभव को दर्शाता है। यहां वसंत पंचमी से ही होली का उत्सव शुरू हो चुका है। वर्तमान में ब्रज के मंदिरों में होली से जुड़ी पद-पदावलियों का गायन किया जा रहा है।
इसमें ब्रज की प्राचीन पारंपरिक होली से जुड़ा परिदृश्य देखता है। मंदिरों में गाई जा रही होली की धमार और पदावलियों में होली के पुराने रंग चोबा, चंदन, अगरू, अरगजा एवं कुमकुमा का गायन हो रहा है। लेकिन अब होली के परिदृष्य से ये प्राकृतिक रंग सिर्फ गायन तक ही सिमट कर रह गए हैं। मंदिरों में होली के रंगों में ये अब नजर नहीं आते हैं। अब सिर्फ कुछ मंदिरों में टेसू के फूलों का रंग भले ही इस परंपरा को निभाए हुए हैं।
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बहुत जटिल है इन रंगों को तैयार करने की प्रक्रिया
अबुल फजल की प्रसिद्ध रचना आइन ए अकबरी में भी मिलती है। 16वीं सदी में अबुल फजल ने फारसी में इस प्रविधि का अभिलेखीकरण कर इसे यथार्थ के धरातल पर उतारा था। चोबा बनाने में एक सप्ताह का समय लगता था। एक सेर अगरू की लकड़ी, चावल की भुसी, साफ मिट्टी और कपास के मिश्रण से वाष्पीकरण द्वारा 2 से 15 तौला तक चोबा प्राप्त होता था। अरगजा बनाने के लिए मेद, चोबा, बनफशा, गेहला, गुलाब, चंदन तथा कपूर प्रयुक्त होते थे। होली पर इनके उपयोग के दौरान महक आसपास के वातावरण को भी महका देती थी।
- डॉ. राजेश शर्मा, शोध एवं प्रकाशन अधिकारी वृंदावन शोध संस्थान
16वीं सदी से गाए जा रहे पदों में मिलता है इन रंगों का उल्लेख
16वीं सदी के बाद से आज तक मंदिर संस्कृति में जिसने भी श्यामा-श्याम की होली गायी और लिखी है, उसकी बात इन प्राकृतिक रंगों की महक के बगैर पूरी न हुई। सूरदास ने लिखा है हरि संग खेलन फाग चली, चोबा चंदन अगरू अरगजा छिरकत नगर गली... मंदिर संस्कृति में ब्रज भाषा के होली साहित्य की वृहद परंपरा है, लेकिन आज प्राय: लोग इससे जुड़ी उन जानकारियों से अनभिज्ञ है कि किस प्रकार ये तैयार होते थे। इन्हें तैयार करने में किन चीजों की जरूरत है। बदलते दौर के साथ अब सब कुछ आसानी से हासिल करना चाहते हैं, जिससे ये प्राकृतिक रंग ओझल हुए हैं।
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- सुरेश चंद्र शर्मा, संरक्षक ब्राह्मण महासभा, वृंदावन
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