मथुरा। लंकेश भक्त मंडल के तत्वावधान में विजयादशमी को लंकापति महाराज दशानन की शोभायात्रा निकाली गई। लंकेश के स्वरूप द्वारा पहले यमुना तट स्थित प्राचीन शिव मंदिर में महादेव की विधिविधान पूर्वक पूजा की गई। पंचामृत अभिषेक किया गया। महाआरती करते हुए पुतला दहन परंपरा का विरोध किया गया।
शुक्रवार को लंकेश वक्त मंडल के तत्वावधान में महाराज दशानन को शोभायात्रा निकाली गई। दशानन के स्वरूप को शोभायात्रा में रथ में विराजमान करते हुए राजकीय इंटर कॉलेज प्रांगण से यमुनापार स्थित शिव मंदिर तक ले जाया गया। जहां उनके भक्तों ने हर हर महादेव, जय लंकेश की जयजयकार की। मंदिर में बाबा भोलेनाथ का विधिविधान पूर्वक पंचामृत अभिषेक दशानन के स्वरूप से कराया।
इस दौरान घंटा और घड़ियाल की धुन के साथ शिव तांडव स्त्रोत पाठ यमुना तट पर किया गया। तदोपरांत लंकेश स्वरूप द्वारा भोलेनाथ की आरती की गई। तदोपरांत भक्त मंडल के लोगो ने त्रिकाल दर्शी दशानन की महाआरती की गई। लंकेश भक्त मंडल के अध्यक्ष ओमवीर सारस्वत एडवोकेट ने कहा कि हिंदू संस्कृति में किसी भी व्यक्ति का अंतिम संस्कार एक ही बार किया जाता है, लेकिन हर वर्ष जो लोग रावण का पुतला बुराई के रूप में जलाते हुए बुराई पर अच्छाई की जीत बताते हैं वो एक कुप्रथा है।
भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए समुद्र तट पर रावण को अपना आचार्य बनाकर महादेव जी की पूजा कराई थी, जिसे रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है। जहां रावण ने अपने आचार्य धर्म का पालन करते हुए भगवान श्रीराम को लंका पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया था।
संजय सारस्वत ने कहा है कि जब दशानन युद्ध भूमि में परास्त होकर अपने शरीर को त्याग कर विष्णु लोक को जा रहे थे, तब भगवान श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को राजनीति की शिक्षा ग्रहण करने के लिए रावण के पास भेजा था। भगवान श्रीराम ने रावण का सम्मान किया था तो उनके भक्त रावण का सम्मान क्यों नहीं करते। इस परंपरा पर रोक लगनी चाहिए। इसके लिए उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की जाएगी।