पाडर वन स्थित कुंड में नौका बिहार करते राधा-कृष्ण के स्वरूप।
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बरसाना (मथुरा)। राधारानी की माता कीरत की तपोभूमि सैकड़ों वर्षों से विलुप्त थी। इस विलुप्त प्राचीन कुंड एवं रास मंडल को पद्मश्री रमेश बाबा के अनुयायियों ने खोज निकाला था। शनिवार को राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं में से एक नौका विहार लीला हुई। इसके दर्शन कर श्रद्धालु झूम उठे। राधा-कृष्ण के जयघोष से पाडर वन गुंजायमान हो उठा।
मान्यता है कि पाडर वन वृषभानु जी और माता कीरत की तपस्थली होने के साथ-साथ राधा-कृष्ण की लीला स्थली थी। यहीं से राधारानी ने सांझी लीला का प्रादुर्भाव किया था। ग्रंथों में सांझी लीला के उल्लेख मिलते हैं कि राधारानी सांझी बनाने के लिए पुष्पों का चयन पाडर वन से करती थीं। कुंड के विषय में ग्रंथों के अनुसार राधाकृष्ण की लीला के दौरान कृष्ण बंशी बजाते हैं, बंशी बजाने के दौरान गोपियों के साथ मोर नाचने लगते हैं। तभी हल्की बारिश आ जाती है। जिससे कृष्ण की पीतांबरी भीज जाती है, तभी से इस कुंड का नाम पींगरी कुंड पड़ा था। यह स्थली सैकड़ों वर्षों से विलुप्त हो चुकी थी।
पुराणों में उल्लेख मिलने के बाद यदा कदा संत उक्त स्थल के दर्शन करने जाते तो उनको रास्ता नहीं मिलने से भटक जाते थे। यह स्थल कुछ वर्षों से अवैध पट्टों के कारण कब्जाधारियों ने कब्जा कर उसका रास्ता बंद कर दिया था। हाल के कुछ वर्षों में मान मंदिर के विरक्त संत पद्मश्री रमेश बाबा के एक अनुयायी दासुनादास, कृष्ण दास वहां जाकर रहने लगे। उनके साथ एक अन्य साधु ने पहले तो लुप्त रास मंडल व गुफा को खोजकर उसका निर्माण कराया। उसके बाद संत ने रमेश बाबा को कुंड होने की जानकारी दी तो रमेश बाबा ने मान मंदिर से सुनील सिंह के साथ सैकड़ों साधु व गुरुकुल के बच्चों को कुंड की खोदाई के लिए भेज दिया। दिन-रात की खोदाई के बाद सभी की मेहनत रंग लाई और कुंड का पुराना स्वरूप निकल आया। शनिवार को पाडर वन पर राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं का आयोजन किया गया। इसमें राधाकृष्ण को नौका विहार कराया गया।