एलआईसी को पालिसी धारक की उत्तराधिकारी को बीमा के तीन लाख रुपये ब्याज के साथ देने होंगे। दरअसल कंपनी ने पालिसी धारक पर हकीकत छुपाकर बीमा कराने का आरोप लगाते हुए क्लेम निरस्त कर दिया था। एलआईसी का कहना था कि बीमा धारक को पहले भी हार्टअटैक पड़ चुका था, लेकिन यह बात छुपाई गई।
जबकि परिवार वालों ने सारे आरोप नकारते हुए सर्विस का पूरा रिकार्ड लगाया जिसमें कोई भी आकस्मिक अवकाश नहीं लिया गया है। इस पर उपभोक्ता फोरम ने नोमिनी को बीमा की रकम देने का आदेश दिया है।
हाथरस जिले के गांव बधैना-कंजौली निवासी बलवीर सिंह ने 18 मार्च 2004 को एलआईसी से दो पालिसी कराईं और नियमित किस्तों की अदायगी करते रहे। आठ जनवरी 2007 को बलवीर सिंह को तबीयत बिगड़ने पर आगरा स्थित एसए कालेज में भर्ती कराया गया जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। इसकी वजह हार्टअटैक बताया गया।
बलवीर सिंह की पत्नी सत्यवती उत्तराधिकारी थीं लिहाजा उन्होंने बीमे की रकम के लिए दावा दाखिल किया। 24 जून 2007 को एलआईसी ने क्लेम को निरस्त कर दिया। तर्क दिया गया कि बलवीर सिंह को 1991 और 2001 में भी हार्टअटैक पड़ा, लेकिन बीमा कराते वक्त यह बात छिपाई गई।
क्लेम निरस्त होने के बाद बलवीर सिंह की पत्नी ने उपभोक्ता फोरम में वाद दायर कर दिया। जिसमें कहा गया कि बलवीर लघु सिंचाई विभाग में तकनीशियन थे। यदि उन्हें हार्टअटैक आया होता तो दफ्तर नहीं जा पाते। जबकि उन्होंने 2007 तक कोई आकस्मिक अवकाश नहीं लिया, इसका प्रमाण विभाग के अधिकारियों ने प्रस्तुत किया। इसके बाद फोरम ने बीमित राशि तीन लाख रुपये मय ब्याज के देने और दो हजार रुपये वाद व्यय देने के आदेश दिए हैं।