ब्रजोत्सव का शुभारंभ करते अतिथगण।
वृंदावन। प्रोफेसर विद्योत्तमा मिश्रा ने कहा कि ब्रज भारत का हृदय है। ब्रज प्रेम, भाव, लीला, कर्म, योग, शौर्य एवं शक्ति की भूमि है। यजुर्वेद, पद्म पुराण, वराह पुराण एवं संहिताओं में ब्रज का उल्लेख मिलता है। श्रीकृष्ण ने ब्रज में उत्सव एवं पर्यावरण रक्षक संस्कृति की स्थापना की।
यह विचार उन्होंने वृंदावन शोध संस्थान में सोमवार को ब्रजोत्सव के छठवें दिन ब्रज बानी कहै ब्रजराज कहानी विषय पर व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए। ब्रजोत्सव के प्रथम सत्र की शुरूआत गोपाल सहस्त्रनाम के पाठ से हुई। समाज गायन, ब्रज बानी कहै ब्रजराज कहानी विषय पर व्याख्यान, ब्रज के वस्त्र अलंकरण विषय पर प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष स्वामी महेशानंद सरस्वती ने कहा कि ब्रज संस्कृति भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। ब्रजभाषा में आत्मकथा, काव्यशास्त्र, वीर काव्य एवं भक्ति काव्य की रचना हुई है। संस्थान अध्यक्ष आरडी पालीवाल ने बताया कि संस्थान की सांस्कृतिक शोध यात्रा के 58 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। पिछले 58 वर्षों में संस्थान ने ब्रज संस्कृति एवं ब्रजभाषा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इससे पूर्व व्याख्यान कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीबांकेबिहारी के चित्रपट पर माल्यार्पण से हुआ।
रासलीलानुकरण में प्रयुक्त वस्त्र अलंकरणों पर आधारित प्रदर्शनी का लोकार्पण किया गया। रंगनाथ पादुका वैदिक गुरूकुल के छात्रों द्वारा स्वस्तिवाचन, मंगलाचरण भूमिका उपाध्याय द्वारा एवं प्रभुदास बाबा द्वारा काव्य प्रस्तुति दी गई। विनोद झा ने गोपाल मंदिर में गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ किया। पुलकित खण्डेलवाल, हितशरण दास, राधावल्लभ दास, व्यासनंदन, माधुरी शरण, प्रेम बिहारिन दास एवं गंगा प्रिया द्वारा समाज गायन किया गया। पार्थ सारथी मिश्र तन्मय साधक सम्मान ध्रुपद गायिका भव्या सारस्वत को दिया गया। संस्थान के निदेशक डॉ. राजीव द्विवेदी ने कहा कि ब्रजभाषा एवं ब्रज संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु संस्थान कटिबद्ध है। द्वितीय सत्र में ब्रजभाषा कवि सम्मेलन में मोहनलाल मोही, डॉ. नीतू गोस्वामी, डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी, अशोक अज्ञ, शिवांगी प्रेरणा, अटलराम चतुर्वेदी, रेनू उपाध्याय एवं राम गोपाल ग्वाल द्वारा मनोहर काव्य पाठ किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संत बलराम बाबा, स्वामी गोविंदानंद तीर्थ, पद्मश्री कृष्ण कन्हाई आदि मौजूद रहे।