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आज जन्म लेंगे दाऊजी महाराज

Fri, 18 Sep 2015 11:19 PM IST
राजेश पाठक
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ब्रज में कन्हैया के जन्म के बाद उनके बड़े भ्राता दाऊजी महाराज का आगमन होने वाला है। ब्रज के  राजा के रूप में पूजे जाने वाले नंद के पुत्र बलराम आज जन्म लेंगे। बलदेव छठ के रूप में मनाए जाने वाले उनके जन्मोत्सव की श्रीदाऊजी मंदिर में सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
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शनिवार को सुबह मंदिर में दाऊजी का विशेष अभिषेक कर उन्हें हीरे-जवाहरात धारण कराए जाएंगे। ब्रजराज इन्हीं हीरे-जवाहरातों के साथ दर्शन देंगे। दोपहर में बलदेवजी के समक्ष मल्ल विद्या का प्रदर्शन होगा। उनके जन्म की खुशी में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद होने वाले नंदोत्सव की तरह ही दधिकाधौं उत्सव का आयोजन होगा।

इसमें प्रसाद स्वरूप नारियल, फल, मेवा, हल्दी, माखन, मिश्री और दही के रूप लाला की छीछी लुटाई जाएगी। जिसे लूटने को भक्तों में होड़ मचेगी। लूटने के लिए मल्ल विद्या का प्रदर्शन होगा। इस दौरान ‘नंद के आनंद भयौ जय दाऊदयाल की..., बिरज में जन्मे बलदेव बधाई बाजे घर-घर मंगलचार... आदि स्वर समाज गायन में सुनाई देंगे। घर-घर में पकवान, मिठाई, लड्डू, मठरी, गुजिया बना कर लोग अपने इष्ट को भोग लगाएंगे।
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बलदेव प्रतिमा का पौराणिक महत्व
बलरामजी की विशाल प्रतिमा का श्रीकृष्ण के पौत्र ब्रजनाभ ने अपने पूर्वजों की पुण्य स्मृति में निर्माण कराया था। बलरामजी का यह विग्रह जो द्वापर युग के बाद काल शेष से भूमिस्थ हो गया था, इसके प्राक्ट्य का रोचक इतिहास है। गोकुल में महाप्रभु बल्लभाचार्य के पौत्र गोस्वामी गोकुल नाथजी को बलदेवजी ने स्वप्न दिया कि श्यामा गाय जिस स्थान पर प्रतिदिन दूध स्त्रवित कर जाती है, उस स्थान पर भूमि में उनकी प्रतिमा दबी है। उन्होंने भूमि की खोदाई करा कर श्रीविग्रह को निकाला। गोस्वामी ने विग्रह को तपस्वी कल्याणदेवजी को पूजा अर्चना के लिए सौंप दिया। इसके बाद मंदिर का निर्माण कराया गया। तब से आज तक कल्याणदेवजी के वंशज ही मंदिर में पूजा सेवा कर रहे हैं।


कलयुग में हरते हैं कष्ट
जनपद मुख्यालय से पूर्वी छोर पर 20 किलोमीटर दूर स्थित बलदेव नगरी में बलरामजी का श्रीविग्रह करीब आठ फीट ऊंचा, साढ़े तीन फीट चौड़ा और श्यामवर्ण है। पीछे शेष नाग सात फनों से युक्त मूर्ति की छाया करते हैं। विग्रह नृत्य मुद्रा में है। दाहिना हाथ सिर से ऊपर वरद मुद्रा में है। बाएं हाथ में चशक है। विशाल नेत्र, भुजाएं, भुजाओं में आभूषण, कलाई में कड़ूला है। मुकुट में बारीक नक्काशी है। दाऊजी पैरों में आभूषण और कमर में धोती पहने हैं। मूर्ति के कान में कुंडल, कंठ में बैजयंती माला है। मूर्ति के सिर के ऊपर के तीन बलय हैं। मान्यता है मंगला के जो दर्शन करता है, वह कभी कंगला नहीं हो सकता।


इसलिए हैं ब्रज के राजा
जब सभी देव ब्रज को छोड़ कर चले, तब बलदेवजी ही ब्रज के संरक्षक और रक्षक के रूप में अड़े रहे। इसलिए दाऊजी महाराज को ब्रज का राजा माना गया। ब्रजराज बड़े सरल व दयालु स्वभाव के हैं। आज भी कलयुग में असंख्य श्रद्धालु अपनी बगीची आदि स्थानों पर भांग घोंटते छानते समय बलदेवजी को भांग को पीने का आमंत्रण देते हुए कहते हैं कि दाऊजी महाराज ब्रज के राजा, भांग पीवे तो यहां आजा।
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