मथुरा में दाऊजी के जन्म के मुख्य आयोजन बलदेव स्थित श्रीदाऊजी महाराज मंदिर पर होंगे। 'बधाई बाजे घर-घर मंगलाचार, बिरज में जन्मेंगे बलदेव कुमार' दाऊजी के दर्शन को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी है।
तीर्थनगरी मथुरा ही नहीं पूरे ब्रज क्षेत्र में गुरुवार को श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ जी का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। चारों ओर उत्सवों की धूम है। खुशियों का दौर जारी है। बधाई गायन हो रहे हैं। देशभर से भक्त यहां विशेष उत्साह के साथ उत्सव में शामिल होने पहुंचे हैं।
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बलदेव के श्री दाऊजी महाराज मंदिर पर मुख्य आयोजन हो रहा है। सुबह से ही बलदाऊ जी महाराज के दर्शन को भीड़ उमड़ रही है। क्षीर सागर स्थित दाऊ दादा व देवकी मैया मंदिर में बलदाऊ का आभिषेक हुआ। मुख्य मंदिर श्रीदाऊजी महाराज में विशेष अभिषेक हुआ। इसके बाद हीरा जवाहरात से शृंगार हुआ। इसके बाद आरती उतारी गई। यहां पर दोपहर को नंदोत्सव के रूप में दधिकाधौं उत्सव मनाया गया। इसमें प्रसाद स्वरूप नारियल, फल, मेवा के साथ हल्दी, माखन, मिश्री, दही के रूप लाला की छीछी लुटाई गई। इसे लूटने के लिए मल्ल विद्या का प्रदर्शन हुआ।
मुख्य मंदिर श्री दाऊजी महाराज के जन्म की कथा
गर्ग संहिता के बलदेव खंड में शेषावतार बलदेव के जन्म की रोचक कथा का वर्णन है। लिखा है कि देवकी के सातवें गर्भ में भगवान अनंत का आगमन हुआ। वसुदेवजी की दूसरी पत्नी रोहिणी भी कंस के भय से नंदबाबा के यहां गोकुल में रहती थी। भगवान की आज्ञा पाकर योगमाया ने भगवान अनंत को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को जो स्वाति नक्षत्र और बुधवार का दिन था, मध्याह्न के समय, तुला लग्न में पांच ग्रह उच्च होकर स्थित थे, रोहिणी के गर्भ से बलदेव का जन्म हुआ। बलदेव के नीरज पांडेय ने बताया कि प्रभु के चमत्कार के कारण इनका नाम संकर्षण पड़ा है।
बलदेव के क्षीरसागर स्थित दाऊदादा मंदिर में दाऊजी और रेवती मैया मंदिर में भक्त व सेवायत
- फोटो : अमर उजाला
कुषाण काल से पहले की प्रतिमा
शेषावतार बलराम की विशाल प्रतिमा भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र ब्रजनाभ ने अपने पूर्वजों की पुण्य स्मृति में स्थापित कराई थी। यही प्रतिमा द्वापर युग के बाद कालशेष से भूमिस्थ हो गई। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार बलदेव में स्थापित मूर्ति कुषाण काल से पूर्व की है। इसका निर्माण काल 3000 वर्ष या इससे अधिक है। विग्रह के प्राकट्य का इतिहास भी रोचक है। मान्यता हे कि गोकुल में महाप्रभु वल्लभाचार्य के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ को बलदेव ने स्वप्न दिया कि श्यामा गाय जिस स्थान पर प्रतिदिन दूध स्त्रवित कर जाती है।
उस स्थान पर भूमि में उनकी प्रतिमा दबी हुई है। भूमि की खोदाई कराई गई तो श्रीविग्रह निकला। गोकुलनाथ ने विग्रह को तपस्वी कल्याण देवजी को पूजा अर्चना के लिए सौंप दिया और मंदिर का निर्माण कराया। तब से आज तक कल्याणदेव के वंशज ही मंदिर में नित्य प्रतिदिन पूजा सेवा कर रहे हैं।
रामावतार में छोटे तो कृष्णावतार में बने बड़े भ्राता
भगवान बलराम को शेषावतार माना जाता है। रामावतार में लक्ष्मण के रूप में छोटे भाई बनकर प्रकट हुए तो वे ही कृष्णावतार में बडे़ भाई बने। दाऊजी महाराज को प्रतिदिन प्रिय भोग प्रसाद के रूप में माखन मिश्री, खीर पूड़ी, भांग, दूध, पेड़ा का भोग लगता है। धर्माचार्यों में बल्लभाचार्य, निम्बार्क, माध्व, गौड़ीय, रामानुज, शंकर, कार्ष्णि उदासीन आदि नियमित रूप से पधारते रहते हैं।
मान्यता है कि जब सभी देव ब्रज को छोड़ कर चले, तब बलदेव ब्रज के संरक्षक और रक्षक बनकर यहीं रहे। इसलिए दाऊजी को ब्रज का राजा माना जाता है। मान्यता यह भी है कि ब्रजराज प्यार और श्रद्धा से पुकारे जाने पर अदृश्य रूप में उपस्थित हो जाते हैं। तभी तो आज भी असंख्य श्रद्धालु अपनी बगीची में भांग घोंटते के बाद भांग का भोग लगाते समय दाऊजी महाराज को भांग पीने का आमंत्रण इस प्रकार देते हैं-‘दाऊजी महाराज ब्रज के राजा, भांग पीवे तो यहां आजा’।