मथुरा। द्वापर में कंस की आंखों की किरकिरी बने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को रंगभूमि में मल्लों के माध्यम से मरवाने की गोपनीय रणनीति बनाई गई थी। कंस की मंशा को भांप चतुर्वेदी ब्राह्मणों ने भगवान श्रीकृष्ण को इस नीति से अवगत कराया। कंस वध के इस विजयी उत्सव में चतुर्वेदियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था।
‘ओ कृष्ण बलदेव यमुना मइया, ऐसी आवे जब नजर आवे हाथी पे सवार नजर आवे’ आचार्य डा. पुरुषोत्तम दास चतुर्वेदी बताते हैं कि उक्त पंक्तियों के गान के साथ समूचा चतुर्वेदी समाज भगवान श्रीकृष्ण की विजय के लिए ईश्वर से आराधना करता है। कंस वध विजय उत्सव की ये पंरपरा आज भी जीवंत हो उठती है।
अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री प्रयागनाथ चतुर्वेदी बताते हैं कि इस बार आगामी शुक्रवार को मनाए जाने वाले इस मेले को लेकर आज भी चतुर्वेदियों में वहीं पुराना उत्साह नजर आता है। दूरदराज में बसे समाज के लोग इस उत्सव में शामिल होने के ब्रज आकर खुद को धन्य मानते हैं।
घर-घर सज रहीं है लाठियां
मथुरा (ब्यूरो)। परंपरा है दीपावली के बाद भइया दौज का उत्सव करने के साथ ही घर-घर कंस मेले की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इसमें परंपरागत वेश-भूषा के सिलवाने के साथ ही कंस वध के लिए लाठियों को सजाया जाता है। इसमें सर्वप्रथम लाठियों को धोने के बाद मेंहदी लगाकर सूखने के लिए रख दिया जाता है। कार्तिक अष्टमी के दिन इन लाठियों से मेंहदी छुड़ाकर सरसों का तेल लगाया जाता है। ताकि लाठी मजबूती के साथ चमक उठे। इस लाठी को कंस मेला वाले दिन इत्र, चांदी, सोने वरक से सजा कर समाज के लोग लाठियों के साथ मेले में शामिल होते हैं।
अखाड़ों पर बनती है रणनीति
मथुरा (ब्यूरो)। अक्षय नवमी को प्रात: समाज के अखाड़े मोहन बाग, गिरधर पुर वाला अखाड़ा, छोंकन वाली बगीची, चोकी अखाड़ा, गोविंद गढ़, लक्ष्मण गढ़, भवंत गढ़, पीपलवाला अखाड़ों पर समाज की सामूहिक भांग ठंडाई का आयोजन होता है। यहीं पर कंस वध के लिए रणनीति तैयार की जाती है। ये पुरानी परंपरा है जिसे समाज आज भी निर्वहन कर रहा है।
विदेशों से भी आए समाज के लोग
मथुरा (ब्यूरो)। समाज की नई पीढ़ी भी मेले के प्रति उत्साहित है। ये ही वजह है कि जो युवा देश के बाहर अपना जीवन यापन कर रहे हैं वो भी मेले में शामिल होने के लिए मथुरा पहुंच गए हैं। अमेरिका में रह रहे डा. अनूप चतुर्वेदी बताते हैं कि मेले में शामिल होने के साथ ही पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। आधुनिक जीवन शैली में भी वो परंपरागत वेषभूषा पहन कर ही मेले में शामिल होते हैं। सउदी अरब बहरीन से आए नरेंद्र चतुर्वेदी नैनी दो दशक से विदेश में हैं और लगातार कंस मेले में शामिल होते रहे हैं। मेेले को लेकर उनमें आज भी गजब का उत्साह है।
‘कंस मेले की परंपरा चतुर्वेदी समाज की नई पीढ़ी भी बखूबी निभा रही है। यह मेला समाज की एकजुटता केे साथ ही परंपराओं के प्रति लोगों का रुझान उत्साहवर्धन करता है।’
-महेश पाठक
मुख्य संरक्षक, श्रीमाथुर चतुर्वेद परिषद मथुरा।