मथुरा। जिले की 65 फीसदी वक्फ संपत्तियों के अस्तित्व पर संकट गहराने लगा है। इनका अंतिम तिथि पांच दिसंबर तक उम्मीद पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन नहीं हो सका है। इसमें जिले की अधिकतर पुरानी वक्फ संपत्तियां शामिल हैं, जिनके रेवेन्यू रिकॉर्ड से लेकर वक्फ बोर्ड तक के कई दस्तावेज नहीं मिले हैं। ऐसे में मुतवल्लियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। अब वक्फ ट्रिब्यूनल कोर्ट में दावा पेश करके ही संपत्ति पर हक जता सकेंगे।
आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल 920 वक्फ संपत्तियां पंजीकृत हैं। इनका पंजीकरण पांच दिसंबर तक उम्मीद पोर्टल पर होना था लेकिन महज 35 प्रतिशत संपत्तियों का ही पंजीकरण हुआ है। वक्फ कॉर्डिनेटर शबनम कुरैशी का कहना है कि कई संपत्तियों के मुतवल्लियों की वर्षों पहले मृत्यु हो चुकी है, जिससे दस्तावेज जुटाना मुश्किल रहा है। पुरानी होने के कारण कुछ संपत्तियों के दस्तावाजों का अभाव रहा। इनका न तो रेवेन्यू रिकॉर्ड में अभिलेख मिले और न ही लखनऊ स्थित वक्फ बोर्ड में कोई साक्ष्य मौजूद मिले। इसलिए जिले की करीब 65 फीसदी संपत्तियां उम्मीद पोर्टल पर दर्ज नहीं हो सकी हैं।
इसमें सदर बाजार के कैंट क्षेत्र स्थित गोल्फ कब्रिस्तान उम्मीद पोर्टल पर दर्ज नहीं हो सका है। इसमें सेना के जवान घुड़सवारी का प्रशिक्षण लेते हैं। इसके अलावा भूतेश्वर तिराहे के निकट कब्रिस्तान भी विवाद के कारण उम्मीद पोर्टल पर दर्ज नहीं हो सका है। दस्तावेजों के अभाव में सदर के बाढ़पुरा स्थित कब्रिस्तान भी पोर्टल पर दर्ज नहीं हो सका है। कॉर्डिनेटर का कहना कि अब छह के अंदर ट्रिब्यूनल कोर्ट में दावा पेश करने के बाद इन संपत्तियों पर हक मिल सकता है।
प्रमुख संपत्तियों का हुआ रजिस्ट्रेशन
शहर की प्रमुख और चर्चित अधिकतर संपत्तियों का पोर्टल पर पंजीकरण हो चुका है। इसमें शाही ईदगाह मस्जिद, प्रसिद्ध चौक बाजार की जामा मस्जिद, सदर बाजार मौहल्ला मलियान में स्थित कब्रिस्तान समेत कई संपत्तियां दर्ज हो चुकी हैं।
वर्जन
जो लोग पूरे कागजात के साथ दफ्तर पहुंचे, उनके पंजीकरण हो गए हैं। तय समयसीमा में सभी वक्फ संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन कराना प्रयास रहा, लेकिन करीब 65 फीसदी संपत्तियां विवाद या दस्तावेज के अभाव में पंजीकरण होने से रह गई हैं। अब शासन के दिशा-निर्देश के आधार पर आगे की दिशा तय की जाएगी।
-नीलमा सिंह, जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी