होली जलाने और आखत डालने की परंपराएं बदलीं
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समय के साथ-साथ पुरानी मान्यताएं और आस्थाएं भी बदलती जा रही हैं। प्रमुख धार्मिक पर्वों पर भी अब पहले जैसा माहौल नजर नहीं आता। परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के लिए कटिबद्ध बुजुर्गों के आगे युवा पीढ़ी हावी नजर आ रही है।
पूर्व में जहां भड्डरी होलिका दहन करते थे वहीं अब युवा ही मनमर्जी के अनुसार होली में आग लगा देते हैं। यही हाल आखत डालने का भी है। अब सामूहिक रूप से आखत डालते लोग शायद किसी गांव में ही नजर आ जाएं। अन्यथा शहर, कसबों और अधिकांश ग्रामों में सुविधानुसार लोग टुकड़ों में जाकर आखत डालने की परंपरा निभाते हैं। अब न तो आखत डालने के लिए जौ की बालियों का ही विशेष महत्व रह गया है और न ही होलिका दहन को लेकर होने वाली तैयारियों का। ऐसा लगने लगा है कि अब लोग परंपराओं के नाम पर महज औपचारिकताओं का ही निर्वहन कर रहे हैं। बुजुर्ग सुरेश सिंह भदौरिया बताते हैं कि एक दशक पूर्व तक होली दहन बड़े ही जोश और खरोश के साथ किया जाता था। जहां भी होली रखी जाती थी वहां पहले सामूहिक पूजन किया जाता था उसके पश्चात भड्डरी होली में आग देता था। अब यह सब गुजरने जमाने की बातें हो चली हैं।