नवासा-ए-नबी हजरत इमाम हुसैन की याद में मंगलवार को नौ तारीख पर अलम और ताजियों का जुलूस निकाला गया। नौजवानों ने अखाड़ा में करतब दिखाए। शाम से शुरू हुए प्रोग्राम देर रात तक चलते रहे। देर रात तक जिक्र-ए-करबला, इमाम हुसैन की शहादत को बयां किया गया। बुधवार की शाम को करबला में ताजिये सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
मोहर्रम की नौ तारीख को सुबह से लंगर तकसीम होना शुरू हो गया। कहीं हलीम, तो कहीं बिरियानी तकसीम की गई। देर शाम को अलम और ताजियों को इमामबाड़ा में लाया गया, जहां पर सलाम दी। इमामबाड़ा से शुरू हुआ अलमों और ताजियों का गश्त बड़े चौराहे पर पहुंचा। यहां रात भर अखाडे़दारों ने जमकर तलवार से अखाड़ा किया। जायरीन को कोई दिक्कत न हो इसलिए कहीं शरबत, कहीं हलवा और मलीदा तो कहीं पर कोल्डड्रिंक पिलाई गई। इमामबाड़ा पहुंचकर लोगों ने मुराद पूरी होने पर मेंहदी चढ़ाई। बुधवार को करीब शाम पांच बजे ताजिये बड़ा चौराहा पर एकत्र होंगे और यहां पर अलमदारों को पगड़ी बांधकर पुरस्कृत किया जाएगा। करबला पहुंच कर सुपुर्द-ए-खाक कर दिए जाएंगे। जामा मस्जिद के इमाम मोहम्मद शमी अहमद ने कहा कि इमाम हुसैन ने करबला के मैदान में खुदा की राह में कुर्बान करके इंसानियत को बचा लिया। उधर करहल में नगर के प्रमुख मार्गों से होकर अलमों और ताजियों का जुलूस निकाला गया। जुलूस के आगे लोगों ने मरसिया पढ़े।