अब उठाने को नहीं मिलता फाग का आनंद
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होली से पूर्व और होली के आठ दिन बाद तक ग्रामीण क्षेत्रों में ढोलक, मजीरों एवं झांझ की थाप पर लोकगीत फाग गाए जाते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा समाप्त होती जा रही है। अब लोकगीत केवल सीडी और चिप तक सिमट कर रह गए हैं। इस बार भी होली पर फाग नहीं गाए गए।
ग्रामीण क्षेत्र में होली के बाद लोग अपनी वर्ष भर की आपसी दुश्मनी भूलकर एकत्रित होते थे और ढोलक, झांझ एवं मंजीरों पर सामूहिक रुप से फाग गाते थे। ग्रामीणों की टोली दरवाजे-दरवाजे पर फाग गाते हुए पहुंचती थी। जिस दरवाजे पर फाग मंडली पहुंचती थी उस घर के लोग मंडली में शामिल लोगों पर रंग वर्षा करते थे और गुजिया, पापड़ आदि बांटे जाते थे। इस परंपरा में आपसी कटुता समाप्त हो जाती थी और लोग गले मिलकर एक दूसरे को त्योहार की बधाई देते थे।
बुजुर्ग देवकीनंदन ने कहा कि होली पर होने वाली यह परंपरा दम तोड़ती नजर आ रही है। यही कारण है कि आपसी गिले शिकवे दूर नही हो पा रहे हैं। छोटे-मोटे गिले शिकवे दुश्मनी में बदल रहे हैं। गांव में कई दिनों तक चलने वाली होली सिमट कर एक दिन की रह गई है। ग्राम गुलाबपुरा के बुर्जुग रामसनेही का कहना है कि नव सवंत्सर एवं नई फसल के आगमन का स्वागत गाने बजाने के साथ होता था। इससे सामाजिक समरसता को बल मिलता था। अब स्थित यह हो गई है कि युवा वर्ग नए बेतुके गानों को गा रहे हैं और पुरानी परंपराएं टूटती जा रहीं हैं।