जिले में वन क्षेत्र घटता जा रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने के चलते हम अपने आसपास के पर्यावरण का विनाश करते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि जिले में एक प्रतिशत से भी कम क्षेत्र में वन और पेड़ पौधे लगे हैं। इसकी एक अन्य वजह जागरूकता की कमी होना भी है।
ग्लोबल वार्मिंग से जिला, प्रदेश, देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व चिंतित है। इसका सबसे बड़ा कारण बड़ी संख्या में वनों और पेड़ों का काटा जाना है। कभी सूखा, कभी बाढ़ तो कभी कड़ाके की ठंड के रूप में इसके दुष्परिणाम सामने आते रहे हैं। इसके बाद भी आम आदमी पर्यावरण को लेकर जागरूक नहीं है। जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 2760 वर्ग किमी है। इनमें से मात्र 14 वर्ग किमी क्षेत्रफल में ही वन और पेड़ पौधे लगे हैं। यह जिले के क्षेत्रफल का एक प्रतिशत से भी कम यानि 0.5 प्रतिशत है। हालांकि दो दशक पूर्व तक यह 0.7 प्रतिशत तक था। इसका मुख्य कारण वनों और पेड़ों का अंधाधुंध दोहन किया जाना और नए पेड़ न लगाना है।
इसके अलावा विकास कार्यों और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर भी बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में इटावा-बदायूं फोरलेन बनाने और अब जीटी रोड के चौड़ीकरण में 10 हजार से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। इनके स्थान पर अभी नाम मात्र के ही पौधे लगाए गए हैं। इसके चलते प्रदूषण बढ़ने के साथ ही लोगों को परेशानी भी हो रही है।
प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी सिद्धार्थ अंबेडकर ने बताया कि यही शहरों में आसपास वन क्षेत्र में बढ़ोतरी की जाए तो वहां के वातावरण को दो से पांच डिग्री कम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि प्रतिवर्ष शहर और उसके आसपास बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाते हैं। हालांकि यह और बात है कि लापरवाही के चलते इनमें से अधिकांश पौधे मर जाते हैं।