करहल। मोहर्रम पर निकाले जाने वाले ताजियों के जुलूस के लिए तैयारियां चल रही हैं। कारीगर ताजिया बनाने के काम में जुटे हुए हैं। उनके द्वारा की जा रही ताजियों की अद्भुत कारीगरी देखने के लिए लोग आ रहे हैं।
मोहर्रम की नौवीं तारीख की रात और दसवीं तारीख को दिन में निकाले जाने वाले ताजियों की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। नगर में बनाए जाने वाले ताजियों की उत्तर भारत में अलग पहचान है। बांस की लकड़ियों से बनाया जाने वाला ढांचा और उस पर अबरीयुक्त कागज की महीन डिजाइन की जाती है। ताजिया कारीगर कामिल खलीफा बताते हैं कि एक ताजिया बनाने में एक महीने से अधिक का समय लग जाता है। इसके निर्माण में 25 से 30 हजार की लागत आती है। उन्होंने बताया कि ताजिए की ऊंचाई लगभग 12-13 फीट होती है। प्रत्येक मुस्लिम मोहल्ले में एक-एक पंचायती ताजिया बनाया जाता है। बांस की लकड़ियों से ढांचा तैयार कर ढांचे में ऐतिहासिक इमारतों और किले का रूप दिया जाता है। सफेद मोटे कागज पर डिजाइन कर उसकी कटिंग कर अबरी के ऊपर चिपकाया जाता है। इस ढांचे को लाख के बने बेस पर रखा जाता है। मोहल्ला मनिहारान, खेड़ा, फकीरान, काजी मुहल्ले में पंचायती ताजिया निकाला जाता है। जुलूस में दो दर्जन ताजिए शामिल किए जाते हैं। ताजियों को मोहम्मइ नईम, अलीम, बच्चू मिस्त्री, शहजाद ताजियों के निर्माण में रात दिन जुटे हैं। मोहर्रम की नवीं तारीख को मोहल्ला काजी से ताजियों का जुलूस पड़ाव पहुंचेगा।