दैवी आपदाओं के प्रकोप के साथ जल संकट व बदहाली के लिए बुंदेले खुद गवाह हैं। एक दशक पहले तक मुख्य जल स्रोत रहे कुएं व बिहर (प्राचीन कुएं) की उपेक्षा संकट की इस घड़ी में भारी पड़ रही है। कुओं में कूड़ा-कचड़ा डाले जाने से न सिर्फ उनकी गहराई कम हो गई, बल्कि पानी की झिर भी बंद हो गई है। जल संरक्षण की बातें गोष्ठी व कागजों में ही सिमटी है, लेकिन किसी ने अमल करने की जरूरत नहीं समझी।
खनिज संपदाओं के धनी बुंदेलखंड में नदियों, तालाबों, पोखरों व बांधों की कोई कमी नहीं है। महोबा जिले से सात नदियां निकली हैं। जिनमें ककरआऊ, ब्रह्म नदी, वर्मा नदी, अर्जुन नदी, क्योलारी नदी, चंद्रावल नदी व धसान नदी शामिल हैं।
साथ ही दर्जनों ऐतिहासिक व चंदेल कालीन सरोवर व पाताल तोड़ कुएं लोगों की प्यास बुझाते रहे हैं। एक दशक से लगातार दैवी आपदाओं के प्रकोप ने तालाबों व नदियों का अस्तित्व खतरे में डाल दिया है। जिससे कभी पानी से लबालब रहने वाले यह जल स्रोत स्वयं प्यासे हो गए है।
बुंदेलखंड में सूखे से उपजी बदहाली व पानी की समस्या के लिए जितना कुदरत काकहर जिम्मेदार है। उससे कहीं अधिक बुंदेलों का कसूर है। कभी न सूखने वाले प्राचीन कुओं व बिहर की उपेक्षा इस कदर हुई कि उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया। लोग उनमें कूड़ा व कचड़ा डालने लगे है। ऐसे में उनकी गहराई तो कम हुई ही पानी की झिर भी बंद हो गई।