संवाद न्यूज एजेंसी
महोबा। बड़े लड़इया महुबे वाले, जिनसे हार गई तलवार। एक को मारे दो मर जावे, तीसर खौफ खाए मर जाए...की गूंज इस बार नहीं सुनाई दे रही है। वीरों की धरती महोबा में इस वर्ष सावन माह में भी चौपालें सूनी हैं और आल्हा गायन को लेकर युवाओं में उत्साह गायब है।
भुजाओं में फड़कन पैदा करने वाले वीर रस से ओतप्रोत आल्हा गायन की परंपरा यहां सैकड़ों वर्ष पुरानी है। आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान महाकवि जगनिक ने आल्हा खंड के माध्यम से किया है। यहां प्रतिवर्ष कजली मेले का आयोजन होता है। सावन माह में आल्हा गायन शुरू हो जाता था। चौपालों पर लोग पहुंचकर आल्हा गायन की तान छेड़ते थे। आल्हा गायन के माध्यम से वीरता का बखान होता था लेकिन इस वर्ष आल्हा गायन नहीं सुनाई रहा है।
युवाओं में आल्हा गायन को लेकर रुचि नहीं है। मोबाइल की दुनिया में व्यस्त युवा अपनी वर्षों पुरानी परंपरा को लेकर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इससे आल्हा गायन शैली खामोश है। हालांकि, बुजुर्गों में आज भी आल्हा गायन को लेकर पहले जैसा ही उत्साह है।