मुकद्दस माह रमजान में हर एक नेकी के बदले 70 गुना सबाब मिलता है। रमजान माह में अल्लाह ताला ने कुरान नाजिल किया। रोजे से जीवन में अनुशासन आ जाता है। इबादतें वक्त पर होने लगती है। जुबान को लहजा मिल जाता है। रमजान का महीना बरकतों और रहमतों का महीना है। रमजान माह जीना का सलीखा सिखाता है।
पवित्र माह में चांद की 21, 23, 25, 27, 29 तारीखों में से किसी एक तारीख में शबेकद्र पड़ती है। उलमा रमजान की 27 वीं तारीख को शबेकद्र मानते है। शबेकद्र की पूरी रात इबादत में गुजार दी जाती है। शबेकद्र पर अल्ला ताला जायज मुरादों को पूरा करता है। रोजा हर इंसान पर फर्ज है। अगर किसी मजबूरी में रोजा छूटता है तो उसके एवज में एक गरीब मिस्कीन को दोनों वक्त भर पेट खाना खिलाने का हुक्म है।
रोजा रखने के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त नेक काम करने और इबादत में गुजारना चाहिए। अल्ला ताला ने इस मुकद्दस माह में गरीबों को जकात देने का भी हुक्म फरमाया है। जिससे गरीब वर्ग के लोग भी रमजान माह के बाद ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। कुछ लोग रोजा न रखकर फर्ज को छोड़ने के साथ साथ चौराहों और सड़कों पर चाय नाश्ता करके रोजे के साथ खिलवाड़ करते है।
अल्लाह के प्यारे हबीब हमारे आका रसूलल्लाह सल्लाहो अलैहे वसल्लम मुकद्दस माह रमजान के दिनों में दिन में खाने से परहेज करते है और रात में कुरान की तिलावत करते है। अल्लाहताला को महबूब की यह अदा इतनी पसंद आई कि महबूब के उम्मतियों के लिए कयामत तक एक माह के रोजे फर्ज कर दिए और तरावीह सुन्नत कर दी। यही वजह है कि तकरीबन 1400 साल पहले रोजे रखने की शुरुआत हुई थी। जिस पर आज भी अमल हो रहा है।
रमजान माह में रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं बल्कि आंख, नाक, कान और मुंह का भी रोजा है। रोजे के दौरान किसी की चुगली न करने और सुनने, आंखों से बुरी चीजें न देखने और मुंह से किसी को बुरा भला न कहने का हुक्म है। शरीर के साथ यह मन और आत्मा की शुद्धि भी शामिल है। रोजे के वक्त हर मुस्लिम को सच्चे मन से खुदा की पाक इबादत करना चाहिए।
अल्लाह ताला खुद देता है रोजे का ईनाम
रोजे की इतनी बड़ी फजीलत है कि अल्लाह ताला फरमाता है रोजा मेरे लिए है, इसकी जजा (ईनाम) में खुद हूं। रोजे रखने वालों को अल्लाह ताला खुद ईनाम देता है। इस माह की बेइंतहा फजीलत होने के कारण अल्लाह ताला ने इसी माह में कुरान नाजिल किया है।