महोबा। बच्चों की जिंदगी संवारने और गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो यह कतई मुश्किल नहीं है। हम बात कर रहे हैं विकासखंड जैतपुर के गांव कैथोरा गांव निवासी राधा रानी की, जिन्होंने बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए घर की चहारदिवारी से निकलकर हाथों में ई रिक्शे का हैंडिल थाम लिया है। अब वह प्रतिदिन 300 से 400 रुपये कमा रही है।
राधा रानी गांव की पहली महिला हैं, जिन्होंने घर की दहलीज लांघ कर कुछ कर गुजरने का साहस जुटाया। एक महिला के रिक्शा थामने पर गांव के पुरुष तो दूर महिलाओं ने भी साथ नहीं दिया। राधा रानी बताती हैं कि जब वह रिक्शा लेकर निकली तो गांव के कुछ लोगों ने हूटिंग तक की, तब उनके पति और समूह की अन्य महिलाओं ने उसका हौसला बढ़ाया। यही नहीं उन्हें अकेला समझकर कोई हूटिंग न कर सके, इसलिए कुछ दिन तक कोई न कोई महिला उनके साथ रिक्शे पर आने जाने लगी।
अब वह अकेले रिक्शा चला रही हैं।
बकौल राधा रानी उनके पति जयराम के पास एक बीघा भी जमीन नहीं है। वह मेहनत मजदूरी करके बमुश्किल गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे थे।
अक्सर काम न मिलने पर आर्थिक दुश्वारी भी झेलनी पड़ती थी। इस हालात से निपटने के लिए उन्होंने कुछ कर गुजरने की ठानी। साल भर पहले गांव में छोटे से डिब्बे में परचून की दुकान रखी, लेकिन ग्रामीणों के उधार लेने से दुकान ठप हो गई। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने और उनकी बेहतर परवरिश के लिए छह महीने पहले रिश्तेदारों से रुपया उधार लेकर ई-रिक्शा खरीदकर चलाना शुरू किया। इससे हुई आय से अब तो उन्होंने रिश्तेदारों से बतौर उधार लिया धन भी चुका दिया है। शर्म हया की कोई परवाह किए बिना कैथोरा गांव से बेलाताल कस्बे तक करीब छह किमी तक सवारियां लाने और ले जाने का काम करती है। उधर पति मजदूरी करके पैसा कमा रहे हैं। दोनों की कमाई से परिवार खुशहाल है। दृगपाल (12) कक्षा 7 और छोटू (05) कक्षा एक में गांव के ही प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालय में पढ़ रहे है। अब इन बच्चों को कापी-किताबों और पढ़ाई के खर्च में कोई कमी नहीं आ रही है। घर पर ट्यूशन लगाकर बच्चों को बेहतर शिक्षा दी जा रही है।
बाकी महिलाओं के लिए बनी नजीर
राधा रानी का साहस देखकर दूसरी महिलाओं में भी जागरुकता आई है। गांव की ही सुंदर रानी सारा दिन घर पर बैठी रहती थी, लेकिन राधा रानी को देखकर अब गांव में लगने वाली हाट और मेलों में विसातखाना (सौंदर्य सामग्री) की दुुकान लगाती है। इसी तरह गांव की ही नौनी बाई ग्रामीणों की परवाह किए बिना डलिया में मौसमी वस्तुएं बेचने लगी। इसी तरह भगवती भी अब घर की चौखट से निकलकर सब्जी बेचकर परिवार व पति का सहारा बन गई है।
बच्चों को संभालना रही बड़ी चुनौती
राधा रानी के मुताबिक पति के मजदूरी पर जाने और उनके रिक्शा लेकर निकलने पर बच्चों की देखरेख और उनकी परवरिश चुनौती बन गई। ऐसे में महिला ने कुछ दिन अपनी मां को घर पर रखा। इसके बाद गाड़ी रूटीन आने पर महिला ने पति की मजदूरी छुड़ाकर उसे भी रिक्शा चलाने के प्रति प्रेरित किया। अब पांच घंटे महिला रिक्शा चलाती है तो पति बच्चों की देखरेख करते हैं और पति के रिक्शा चलाने पर वह घर में बच्चों की देखरेख के साथ-साथ खानपान का इंतजाम करती है।