फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आस्था का केंद्र बना शक्तिपीठ

Fri, 20 Mar 2015 11:34 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, महोबा
विज्ञापन
विज्ञापन
दीपेश तिवारी
विज्ञापन

भारतवर्ष के शक्तिपीठाें में शुमार महोबा का चंदेल कालीन ऐतिहासिक बड़ी चंडिका मंदिर सैकड़ों वर्षों से आस्था का केंद्र बना हुआ है। भांड्य यज्ञ के समापन पर चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर में नवरात्र में भक्ति का सैलाब उमड़ता है। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बना यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। 12 फुटी प्रस्तर शिला पर उत्कीर्ण 18 भुजी मां चंडिका की मूर्ति का चंदेल राजाआें के साथ-साथ आल्हा और ऊदल पर भी विशेष कृपा रही है।
बुंदेलखंड की चंदेल नगरी महोबा शक्तिपीठ के लिए भी विख्यात है। सन् 831 ईस्वी में चंदेल वंश के संस्थापक यशस्वी राजा चंद्रवर्मन ने अपने पिता चंद्रदेव के निर्देशन पर खजुराहो में भांड्य यज्ञ के समापन पर महोबा आकर एक विशाल महोत्सव का आयोजन कर देवी शक्तिपीठ की स्थापना की थी। इसकी प्रसिद्धि आज भी सिद्ध पीठ के रूप में जनमानस में व्याप्त है। चामुंडा स्वरूप दक्षिण में स्थापित इस मूर्ति के सामने एक महान स्तंभ या दीप स्तंभ है। जिसके पीछे भगवान गणेश को नृत्य मुद्रा में शिला पर स्थापित किया गया है। कानपुर-सागर हाईवे पर वीरभूमि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के मुख्य मार्ग से 300 मीटर दाईं ओर स्थित बड़ी चंडिका मंदिर चंदेल काल से ही आस्था का केंद्र रहा है।
विज्ञापन

 प्राचीन काल से ही मां बड़ी चंडिका की प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ाकर भव्य श्रंगार करने की परंपरा चली आ रही है। जो आज भी जारी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महोत्सव नगर महोबा का यह स्थान मदन सागर सरोवर के समीप प्राकृतिक सौंदर्य में ताराचंडी सिद्धपीठ के रूप में स्थित है। जिसे आज बड़ी चंडिका मंदिर के नाम से ख्याति मिली है। इसकी स्थापना अति प्राचीन है। इसकी पहचान गहरवार नरेशों के समय सातवीं शताब्दी में हुई। इसके बाद चंदेल नरेश चंद्रवर्मन ने खजुराहो में भांड्य यज्ञ का समापन कर सन् 831 ईस्वी में महोबा आकर देवी को अपना इष्ट मान महान यज्ञ आहूत कर मूर्ति कर स्थापना की। इन्ही देवी के आशीष से चंदेलाें का विजय अभियान प्रारंभ हुआ जो 400 वर्षों तक साम्राज्य विस्तार के रूप में चला। वीर आल्हा ऊदल पर भी मां चंडिका की विशेष कृपा रही है। छतरपुर नरेश विश्वनाथ सिंह और उनके कुंवर भवानी सिंह ने रखरखाव कर द्वार का जीर्णोद्धार कराया। 20वीं शताब्दी के अंत में बलिहारी उपाध्याय ने यहां आजमगढ़  से आकर पुजारी के रूप में सन् 1954 से योगदान देकर पुन: जनमानस में जागरण कर ख्याति दिलाई। तब से उनके पुत्रजन मंदिर की देखरेख करते आ रहे हैं।

आश्चर्यरत मुद्रा में है मां की प्रतिमा
देवी शक्ति के 51 पीठाें में देवी ताराचंडी भी एक हैं। श्री दुर्गा सप्तशती के अनुसार भयंकर दैत्य महिषासुर के प्रबल सेनापति चंड से देवी ताराशक्ति का उत्तराखंड में घोर संग्राम हुआ। जिससे वह भागकर महोबा के इस स्थान पर द्वंद्व करता रहा। आयुध प्रहारों से भी वह क्यों नहीं मर रहा, इसका देवी को आश्चर्य हुआ। मूर्तिकार ने देवी की 18 भुजाआें में से 17 विविध आयुध धारण कर मूर्तिरूप किया। लेकिन मुखारबिंदु पर एक भुजा आश्चर्यरत स्थापित की है। अंत में देवी के घातक प्रहार से आहत होकर चंड कैमूर विंध्य पर्वत श्रंखला की ओर भागा। जहां उसका वध हुआ। दैत्य चंड को चरणाें तले दबाकर तथा मुखारबिंदु के ऊपर गज को शक्ति का प्रतीक उत्कीर्ण कर स्थापित किया है।
विज्ञापन


सती चिह्न आज भी हैं विद्यमान
तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में विदेशी आक्रमणों का सिलसिला आरंभ हुआ। युद्ध दौरान बड़ी संख्या में यहां सैनिक वीरगति को प्राप्त होते रहे। सती प्रथा के तहत सैनिकों की विधवाओं ने सती के रूप में आत्मदाह किए। जिनके चिह्न पीठ के समीप युगल व चंद्र-सूर्य और पंचतत्व रूप पंजा शिलाओं पर अंकित हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें