महोबा। उत्तर भारत के विख्यात कजली मेले के दूसरे दिन लगने वाले गोखारगिरि मेले का भी कोरोना के चलते इस बार आयोजन नहीं हुआ। इससे लोगो को मायूस होकर लौटना पड़ा। इतना ही नहीं इस साल मेला स्थल पर होने वाले दंगल का आयोजन भी स्थगित कर दिया गया है। मेला स्थल पर दुकानें न लगने से सन्नाटा छाया रहा।
गुरू गोरखनाथ की तपोभूमि गोरखगिरि में लगने वाला मेला भी अब इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया है। पहले प्रशासन ने कजली मेले के नाम में इसे खत्म करने की कोशिश की। बची-खुची कसर वैश्विक महामारी कोरोना ने पूरी कर दी। आज गोरखगिरि क्षेत्र में सन्नाटा पसरा हुआ है। आसपास स्थित सभी ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों में न कहीं कोई सजावट हुई और न गांवों से आने वाले श्रद्धालु दिखे।
बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर बताते हैं कि कभी कजली मेला शुरू होने के एक हफ्ते पहले से यहां घूमने वालों की भीड़ नजर आने लगती थी। मंदिरों में रंगाई-पुताई और सजावट शुरू हो जाती थी। दुकानें सजने लगती थी। वीर रस से ओत-प्रोत आल्हा की गूंज सुनाई देने लगती थी। दंगल की तैयारियां शुरू हो जाती थी, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया है।
पृथ्वीराज से जीत के उपलक्ष्य में यहां गोरखगिरि मेले की शुरूआत हुई थी। दूर-दूर से आने वाले लोग गोरखगिरि के ऊपर सिद्ध बाबा, अंधियारी और उजयारी गुफा घूमने जाते थे। इसके अलावा पहाड़ के चारों ओर स्थित काल भैरव, नागौरिया, छोटी चंडिका, महावीरन मंदिर के दर्शन करते थे। यहां तांडव नृत्य करते हुए शिव की 15 फिट ऊंची ऐसी मूर्ति है। जो अपने-आप में अनूठी है। आल्हा परिषद के अध्यक्ष शरद तिवारी का कहना है कि अगली बार से सिर्फ कजली मेले का ही आयोजन किया जाएगा, जो सात दिनों तक चलेगा।