अजनर (महोबा)। सूनी गलियां और अजीब सान्नाटा, हर किसी के चेहरे पर झलकती मायूसी, इस बात की गवाह थी कि परिवार ही नहीं गांव वाले भी घनेंद्र की मौत से ऊबर नहीं पा रहे हैं। यहां हर आंख नम थी। यह नजारा था शुक्रवार को कुलपहाड़ क्षेत्र के बुधौरा गांव का। पिता ने तो किसी से बात तक नहीं की। उसकी आंखों की नमी तो खामोश है, लेकिन मानों ऐसा लग रहा है कि वह घनेंद्र को तलाश रहा है। उसे अभी भी उम्मीद है कि घनेंद्र घर आएगा, लेकिन कुदरत तो कहां मंजूर है। घनेंद्र तो उन्हें सदा के लिए अलविदा कर चुका है।
बुधौरा गांव निवासी भागीरथ कुशवाहा का बेटा घनेंद्र (4) बुधवार को अपने खेत में खुले पड़े बोरवेल में गिर गया था। गुरुवार को एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम ने 20 घंटे के रेस्क्यू के बाद बोरवेल से निकाला था, लेकिन तब तक उसकी सांसे थम चुकी थीं। घनेंद्र की मौत के सदमे से भागीरथ कुशवाहा का परिवार अभी गुमसुम है। शुक्रवार को भी घनेंद्र के परिवार में रोना-पीटना मचा रहा। गांव के लोग और रिश्तेदार उसके घर पर सांत्वना देने आते-जाते रहे। पर, कोई भी जनप्रतिनिधि अथवा राजनीतिक दल का नेता गमजदा परिवार को मदद देने तो दूर ढांढस बंधाने भी नहीं पहुंचा। कालीचरण से घर में चूल्हा नहीं जला, तो गांव वालों ने उनके घर में खाना पहुंचाया, लेकिन परिजन यही कहते रहे कि जिगर का टुकड़ा नहीं रहा तो अब खाना-पीना किस काम का। घनेंद्र ही उनके घर का राजकुमार था, उसके बिना जिंदा रहना मुश्किल हो रहा है। वक्त ने उन्हें ऐसा जख्म दिया, जो जिंदगी भर नहीं भर सकता है।
इधर, देर शाम तक घनेंद्र के बाबा कालीचरण और पिता भागीरथ घर के बाहर बैठे सिसकते रहे। जबकि, मां क्रांति देवी, दादी और बहनें घर के भीतर रोती रहीं। सांत्वना देने पहुंचे लोगों को कालीचरण घटना के बारे में बताते हुए रोने लगते थे। लोग उन्हें समझा कर शांत कराते रहे। यह सिलसिला दिनभर चलता रहा।
राजस्व विभाग की टीम पहुंची
राजस्व विभाग की टीम शुक्रवार को बुधौरा गांव पहुंची। यहां टीम ने मृतक घनेंद्र के परिजनों से बात की। प्रशासन की तरफ से पीड़ित परिजनों को राज्य आपदा मोचन निधि से मिलने वाले मुआवजे के लिए दस्तावेज लिए। टीम ने परिवार को भरोसा दिया कि उन्हें जल्द ही निधि से चार लाख रुपये की सहायता राशि दी जाएगी।