महोबा। होली के त्योहार पर बुंदेलखंड की लोक परंपरा फाग गायन धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। अब न फाग है और न वैसे राग। महीने भर पहले से शुरू होने वाले फाग गायन अब होलिकादहन के आसपास ही सीमित हो गए हैं। इक्का-दुक्का टोलियां फाग गायन की रस्म अदायगी करती दिखती हैं। गांवों की चौपालों पर फाग गायन की महफिल नहीं सजती। झांझ-मजीरे की गूंज के बीच फाग को लोग भूलकर होली गीत के नाम पर भोजपुरी व अन्य फिल्मी गीत सुनते नजर आते हैं।
आपसी सौहार्द का पर्व होली का स्वरूप लगातार बदल रहा है। होली की ठिठोली, गायन धीरे-धीरे रस्मी होते जा रही है। कीचड़ व हानिकारक रंगों के इस्तेमाल होने से लोग पर्व से दूरी बनाने लगे हैं। पहले वसंत पंचमी से होली का पर्व लोगों के बीच नजर आने लगता था। वसंत पंचमी से होली गीत गाने वालों की टोलियां सजने लगती थीं, जो महाशिवरात्रि आते-आते बुलंदी पर पहुंच जाती थीं। लेकिन अब होली की वह मस्ती और फाग गायन के स्वर सुनाई नहीं देते हैं। ईसुरी की फागों में लोक जीवन ही नहीं, करारा व्यंग्य भी देखने को मिलता है, लेकिन युवा पीढ़ी के पुरानी परंपरा में रुचि न दिखाने से अब फाग गायन बीते दिनों की बात होती जा रही है।
इतिहास के जानकार डॉ. एलसी अनुरागी का कहना है कि फाग गायकी के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण उचित मंच न मिलना और प्रोत्साहन का अभाव है। पुराने गायकों को सम्मान व प्रोत्साहन न मिलने से धीरे-धीरे उनका मोहभंग हो रहा है। सभी कालेजों में फाग गायन के आयोजन होने चाहिए। तभी युवा पीढ़ी इसे समझ सकेगी।
साहित्यकार संतोष कुमार पटैरिया का कहना है कि अब होली में न पहले जैसा उत्साह दिखता है और न वैसा आनंद। होली में फाग गायकी की महफिलें भी अब नहीं सज रही हैं। इन परंपराओं को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी इसे भूल जाएगी। ईसुरी की फाग को संरक्षित करने की आवश्यकता है।